Exclusive News: क्या आपने कभी ऐसे मुख्यमंत्री के बारे में सुना है, जिनके राज में घड़ी की सुई ही सबसे बड़ा आदेश मानी जाती थी? उत्तर प्रदेश में एक दौर ऐसा भी था, जब सुबह 10:15 बजे सचिवालय का मुख्य गेट बंद हो जाता था. देर से पहुंचने वाला चाहे अफसर हो, कर्मचारी हो या सरकार का मंत्री-नियम सब पर एक समान लागू होता था. अनुशासन की इसी मिसाल से जुड़ा है पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह का एक चर्चित किस्सा, जो आज भी यूपी की राजनीतिक गलियारों में याद किया जाता है. जिनकी सख्ती के किस्से आज भी सुनाए जाते हैं? आइए जानते हैं पूरी कहानी.
कौन थे वीर बहादुर सिंह?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई ऐसे मुख्यमंत्री हुए, जिन्होंने अपने फैसलों और कार्यशैली से अलग पहचान बनाई. लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह का नाम अनुशासन और समय की पाबंदी के लिए खास तौर पर याद किया जाता है. वीर बहादुर सिंह का जन्म 18 फरवरी 1935 को गोरखपुर जिले के हरनही गांव में हुआ था. कांग्रेस संगठन में उन्होंने तेजी से अपनी पहचान बनाई और 24 सितंबर 1985 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. करीब तीन वर्षों तक उन्होंने प्रदेश की कमान संभाली. मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद वे केंद्र सरकार में संचार मंत्री भी रहे. उन्हें विकास कार्यों के साथ-साथ सख्त प्रशासन और तेज फैसले लेने वाले नेता के रूप में जाना जाता है.
समय की पाबंदी पर नहीं करते थे कोई समझौता
कहा जाता है कि वीर बहादुर सिंह को सरकारी दफ्तरों में देर से पहुंचने की आदत बिल्कुल पसंद नहीं थी. उनका मानना था कि अगर अधिकारी और कर्मचारी समय पर दफ्तर नहीं पहुंचेंगे, तो जनता के काम भी समय पर नहीं हो पाएंगे. यही वजह थी कि मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने सचिवालय में समय को लेकर बेहद सख्त व्यवस्था लागू कर दी. उनका साफ संदेश था कि सरकारी व्यवस्था तभी सुधरेगी, जब हर व्यक्ति समय का सम्मान करेगा. इसलिए नियम सिर्फ कर्मचारियों के लिए नहीं, बल्कि अफसरों और मंत्रियों पर भी बराबरी से लागू किए गए.
सुबह 10:15 बजे बंद हो जाता था सचिवालय का गेट
वीर बहादुर सिंह की इसी कार्यशैली का जिक्र वरिष्ठ पत्रकार श्यामलाल यादव ने अपनी किताब "At the Heart of Power: The Chief Ministers of Uttar Pradesh" में किया है. किताब के मुताबिक, मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने आदेश दिया था कि हर सुबह 10:15 बजे सचिवालय का मुख्य गेट बंद कर दिया जाए. इसके बाद जो भी अधिकारी, कर्मचारी या मंत्री पहुंचता, उसे अंदर प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाती थी. सरकार के भीतर यह संदेश साफ था कि नियम सबके लिए एक समान हैं और किसी को विशेष छूट नहीं मिलेगी.
जब अपने ही मंत्री पर हुई कार्रवाई
इस पूरे किस्से का सबसे चर्चित हिस्सा तब सामने आया, जब एक दिन राज्य के तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री निर्धारित समय के बाद सचिवालय पहुंचे. बताया जाता है कि उन्हें उम्मीद थी कि मंत्री होने के कारण उन्हें अंदर जाने दिया जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मुख्यमंत्री के निर्देश के अनुसार गेट नहीं खोला गया. इतना ही नहीं, बाद में उनकी एक दिन की तनख्वाह भी काट दी गई. इस घटना के बाद सचिवालय में यह चर्चा आम हो गई कि अगर एक मंत्री को भी नियम तोड़ने पर नहीं छोड़ा गया, तो बाकी अधिकारी और कर्मचारियों के लिए भी किसी तरह की ढील की कोई गुंजाइश नहीं है.
किताब में दर्ज है यह चर्चित किस्सा
हालांकि, इस पूरे प्रसंग को लेकर एक बात जानना भी जरूरी है. सचिवालय का गेट सुबह 10:15 बजे बंद होने और मंत्री की एक दिन की तनख्वाह काटे जाने का यह किस्सा वरिष्ठ पत्रकार श्यामलाल यादव की किताब "At the Heart of Power: The Chief Ministers of Uttar Pradesh" में दर्ज संस्मरण (Anecdote) के आधार पर बताया जाता है. इस संबंध में कोई अलग आधिकारिक सरकारी आदेश या सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है. इसलिए इसे एक चर्चित राजनीतिक संस्मरण के रूप में देखा और पढ़ा जाना चाहिए, जो वीर बहादुर सिंह की अनुशासनप्रिय छवि को दर्शाता है.
