एक जौ की रोटी और एक प्याला पानी… फिर कलम से हिला दी अंग्रेजी हुकूमत, कौन थे सूफी अंबा प्रसाद?

Sufi Amba Prasad History: एक जौ की रोटी और एक प्याला पानी पर भी अंग्रेजों से लोहा लेने वाले सूफी अम्बा प्रसाद की बेबाक पत्रकारिता ने ब्रिटिश सत्ता की नींव हिला दी थी. जानें उनकी अनोखी दास्तान.

Sufi Amba Prasad History: एक जौ की रोटी, एक प्याला पानी और हाथ में कलम… सुनने में यह किसी फकीर की जिंदगी लगती है, लेकिन इसी सादगी के पीछे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ऐसा जुनून छिपा था, जिसने ब्रिटिश सत्ता की नींव हिला दी थी. मुरादाबाद के सूफी अम्बा प्रसाद ने तलवार से ज्यादा अपनी कलम को हथियार बनाया और लेखों के जरिए अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की आवाज बुलंद की. गिरफ्तारी, मुकदमे, निर्वासन और मौत का खौफ भी उनके इरादों को नहीं डिगा सका. आखिर कौन थे सूफी अम्बा प्रसाद और कैसे उनकी कलम बन गई अंग्रेजों के लिए सबसे बड़ी चुनौती? आइए जानते हैं उनकी अनसुनी कहानी...

 मुरादाबाद की मिट्टी से निकला था अंग्रेजों को चुनौती देने वाला पत्रकार

 सूफी अम्बा प्रसाद का संबंध अगवानपुर और मुरादाबाद के मोहल्ला कानून गोयान से था. वह उच्च शिक्षित विचारक, पत्रकार और क्रांतिकारी थे. उनकी पहचान सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर नहीं, बल्कि ऐसे लेखक के रूप में भी बनी, जिसकी कलम अंग्रेजी शासन की नीतियों पर खुलकर सवाल उठाती थी. उन्होंने बरेली कॉलेज से स्नातक की शिक्षा हासिल की थी. उर्दू, फारसी, हिंदी और अंग्रेजी पर उनकी मजबूत पकड़ थी. पत्नी के असामयिक निधन के बाद उन्होंने वैराग्य और तसव्वुफ का रास्ता अपनाया. इसी वजह से लोग उन्हें 'सूफी' नाम से जानने लगे.

 1884 में अखबार निकाला, पत्रकारिता को बना दिया आंदोलन का हथियार

 साल 1884 में सूफी अम्बा प्रसाद ने अपने पत्र 'जामेउल उलूम' के जरिए अंग्रेजी हुकूमत और तत्कालीन सत्ता की नीतियों की पोल खोलनी शुरू की. उनके लिए पत्रकारिता सिर्फ खबर लिखने का काम नहीं था, बल्कि जनता को जागरूक करने और सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने का माध्यम था. उनकी बेबाक लेखनी धीरे-धीरे अंग्रेजी शासन के लिए परेशानी का कारण बन गई.

 नवाब रामपुर आय, भाग आय' वाली सुर्खी से मच गया था हंगामा

 सूफी अम्बा प्रसाद की बेबाक पत्रकारिता का एक चर्चित उदाहरण नवाब रामपुर से जुड़ा है. 1884 में उन्होंने नवाब रामपुर की कथित बदउनवानियों के खिलाफ मोर्चा खोला. नवाब के आगमन पर अखबार में उन्होंने “नवाब रामपुर आय भाग आय” जैसी तीखी सुर्खी प्रकाशित कर दी. इससे नाराज नवाब ने उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया. हालांकि अदालत में सूफी साहब ने 'भाग' शब्द की व्याख्या 'भाग्य' यानी किस्मत के अर्थ में की और मुकदमा खारिज हो गया. उनकी यह चतुराई भी उनकी पत्रकारिता की पहचान बन गई.

 पंजाब में किसानों और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर जगाई आजादी की अलख

 इसके बाद सूफी अम्बा प्रसाद ने पंजाब में भी जनजागरण का काम तेज किया. लाला लाजपत राय और सय्यद हैदर रजा के साथ मिलकर उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं और क्रांतिकारी लेखों के जरिए लोगों को जागरूक किया. 'पगड़ी संभाल जट्टा' जैसे किसान आंदोलनों को धार देने और 'भारत माता सोसायटी' के जरिए आजादी की आवाज मजबूत करने में भी उनकी अहम भूमिका रही.

 अंग्रेजों ने मुकदमे चलाए, सजा दी, लेकिन हौसला नहीं तोड़ पाए

 ब्रिटिश सरकार सूफी अम्बा प्रसाद की गतिविधियों से परेशान थी. क्रांतिकारी अखबारों पर पाबंदियां लगाई गईं. सूफी अम्बा प्रसाद, लाला पिण्डीदास और लाला दीनानाथ पर मुकदमे चलाए गए और उन्हें पांच-पांच साल की कठोर सजा सुनाई गई. लेकिन दमन के बावजूद आजादी का प्रचार नहीं रुका. 'स्वराज्य' अखबार और 'भारत माता सोसायटी' के जरिए आंदोलन को आगे बढ़ाने की कोशिश जारी रही.

 एक जौ की रोटी और एक प्याला पानी' पर भी तैयार थे आजादी के सिपाही

 उस दौर की क्रांतिकारी पत्रकारिता कितनी मुश्किल थी, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 'स्वराज्य' अखबार में संपादकों की नियुक्ति की शर्त ही बेहद कठिन रखी गई थी. संपादकों के लिए न्यूनतम शर्त थी—'एक जौ की रोटी और एक प्याला पानी'. नन्द गोपाल और लधा राम जैसे संपादकों की गिरफ्तारी के बाद भी सूफी अम्बा प्रसाद पीछे नहीं हटे. उन्होंने पंजाब के किसानों को संगठित करने और उनमें आजादी की भावना जगाने का काम जारी रखा.

 देश से बाहर जाना पड़ा, लेकिन क्रांति की मशाल नहीं बुझी

 लंदन से गिरफ्तारी के आदेश जारी होने के बाद सूफी अम्बा प्रसाद और सरदार अजीत सिंह ईरान और नेपाल चले गए. निर्वासन का दौर उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने वहां भी लिखना और क्रांतिकारी गतिविधियां जारी रखीं. इसी दौरान उन्होंने 'जामे जम जिंदाबाद', 'तीर ब-हद्फ़' और 'इल्मे-कयाफ़ा' जैसी कई ऐतिहासिक पुस्तकें और अनुवाद लिखे.

 ईरान की जेल में मिली मौत, आखिरी वक्त तक नहीं झुके

 आखिरकार ईरान में ब्रिटिश और मित्र राष्ट्रों की सेना ने उन्हें घेरकर गिरफ्तार कर लिया. उन्हें गोली से उड़ाने का आदेश दिया गया था. लेकिन सितंबर 1920 में जिस दिन उन्हें फांसी या मृत्युदंड दिया जाना था, उसी सुबह वह अपनी जेल की कोठरी में मृत पाए गए. इस तरह मुरादाबाद की धरती से निकला वह क्रांतिकारी, जिसने अपनी कलम, विचारों और साहस से अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी, आखिरी सांस तक आजादी की लड़ाई से जुड़ा रहा. सूफी अम्बा प्रसाद की कहानी आज भी बताती है कि क्रांति सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि शब्दों और विचारों से भी लड़ी जा सकती है.

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By लक्की कुमारी

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