UP News: उत्तर प्रदेश के लगभग बीस जनपदों में पशुओं के मध्य लंपी त्वचा रोग तेजी से विस्तृत हो चुका है. इस संक्रामक प्रकोप से हरियाणा की सीमाओं से सटे क्षेत्र अत्यधिक प्रभावित हुए हैं. आंकड़ों के अनुसार चौदह मवेशियों की दुखद मृत्यु हो चुकी है, जबकि अन्य का उपचार जारी है. स्थिति को नियंत्रित करने हेतु अंतरराज्यीय सीमाओं पर मवेशियों के आवागमन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है. सीमावर्ती क्षेत्रों में विशेष प्रतिरक्षण अभियान चलाकर रोग के प्रसार को रोकने हेतु निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं.
संक्रमण की स्थिति और प्रारंभिक नियंत्रण रणनीतियां
यह संक्रमण लगभग दो माह पूर्व राज्य में प्रविष्ट हुआ था. पड़ोसी राज्यों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर पशुपालन विभाग ने सीमावर्ती क्षेत्रों में दस किलोमीटर की परिधि में टीकाकरण की सुरक्षा पट्टी निर्मित की थी. यद्यपि प्रारंभिक स्तर पर संक्रमण के प्रसार में थोड़ी वृद्धि देखी गई, किंतु वर्तमान समय में प्रथम चरण में प्रभावित हुए क्षेत्रों में नए मामलों में गिरावट दर्ज की गई है. विभाग का दावा है कि स्थिति पर निगरानी बनाए रखने हेतु विशेष दल निरंतर प्रयासरत हैं.
टीकाकरण अभियान की प्रगति और चिकित्सीय देखभाल
विभागीय आंकड़ों के अनुसार अब तक 8562 पशु इस बीमारी की चपेट में आ चुके हैं, जिनमें से 7180 पशु पूरी तरह स्वस्थ हो चुके हैं. प्रभावित क्षेत्रों में कुल पचास लाख टीकों की आपूर्ति सुनिश्चित की गई है, जिनमें से 13.50 लाख से अधिक पशुओं का सफलतापूर्वक टीकाकरण किया जा चुका है. वर्तमान में लगभग 1368 पशुओं का चिकित्सीय उपचार चल रहा है. पशुपालन विभाग के विशेष निगरानी दल ग्रामीण क्षेत्रों में भ्रमण कर मवेशियों के स्वास्थ्य की नियमित जांच कर रहे हैं.
ज़िलावार प्रभावित आंकड़े और क्षेत्रीय निगरानी का लाभ
राज्य में सर्वाधिक मामले सहारनपुर जनपद से सामने आए हैं, जहां 5391 पशु संक्रमित हुए तथा आठ पशुओं की मृत्यु दर्ज की गई. इसके अतिरिक्त गाजियाबाद, मथुरा और बागपत में भी कुछ मवेशियों की हानि हुई है. शामली, मुजफ्फरनगर, मेरठ, फिरोजाबाद, बिजनौर और हापुड़ जैसे जिलों में भी मामले दर्ज किए गए हैं. हालांकि, पूर्वांचल और बुंदेलखंड के क्षेत्रों में समय रहते की गई सख्त बाड़बंदी और निरंतर निगरानी के कारण वहां संक्रमण को काफी हद तक नियंत्रित रखने में सफलता मिली है.
बीमारी के लक्षण और पशुपालकों के लिए महत्वपूर्ण सलाह
निदेशक रोग नियंत्रण के अनुसार यह संक्रमण पशुओं से मनुष्यों में स्थानांतरित नहीं होता है. इसके मुख्य लक्षणों में उच्च ज्वर, शरीर पर गांठें बनना और दुग्ध उत्पादन में तीव्र कमी शामिल हैं. जिन पशुओं की मृत्यु हुई है, उनमें से अधिकतर निराश्रित थे अथवा उन्हें समय पर उपचार प्राप्त नहीं हो सका था. वर्तमान में स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है तथा दैनिक आधार पर राज्य मुख्यालय द्वारा समीक्षा की जा रही है. पशुपालकों को अपने मवेशियों का अनिवार्य टीकाकरण कराने का परामर्श दिया गया है.
