Dr. Anitha Mishra Video: उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में सेवा दे रहीं डॉक्टर अनीता मिश्रा की कहानी आजकल बहुत ही ज्यादा वायरल हो रही है. मूल रूप से कर्नाटक से पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वह गोंडा पहुंचीं, तो उन्हें शुरुआत में स्थानीय भाषा को समझने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा. मरीजों की परेशानी को करीब से समझते हुए उन्होंने सबसे पहले हिंदी और फिर अवधी भाषा सीखने का संकल्प लिया. अब वह हर मरीज से बहुत ही प्यार और सहृदयता से बातचीत करती हैं.
आंचलिक बोली के जरिए मरीजों से आत्मीय जुड़ाव
अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले ग्रामीण मरीज अपनी तकलीफ व्यक्त करते हुए ‘गटई पिरात है’ या ‘चिल-चिल पिरात है’ जैसे आंचलिक शब्दों का उपयोग करते हैं. डॉक्टर अनीता मिश्रा अब इन सभी कठिन शब्दों का सही अर्थ बखूबी समझती हैं और मरीजों को उन्हीं की बोली में सांत्वना तथा सलाह देती हैं. उनका मानना है कि स्थानीय बोली बोलने में कभी भी संकोच नहीं होना चाहिए. यह अनूठी पहल डॉक्टर और मरीजों के बीच विश्वास का एक बेहद मजबूत रिश्ता कायम करती है.
चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं में क्षेत्रीय भाषाओं का महत्व
स्वास्थ्य सेवाओं को जन-जन तक प्रभावी रूप से पहुँचाने के लिए चिकित्सा कर्मियों और आम जनता के बीच स्पष्ट संवाद का होना अत्यंत आवश्यक है. ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर देखा गया है कि भाषा की बाधा के कारण मरीज अपनी शारीरिक तकलीफ सही तरीके से नहीं समझा पाते हैं. ऐसे में जब चिकित्सक स्थानीय बोलियों में बातचीत करते हैं, तो न केवल मरीजों का डर खत्म होता है बल्कि बीमारियों के सही निदान और सटीक इलाज में भी बहुत आसानी होती है.
