UP Crime News: दिल्ली में चलती स्लीपर बस के अंदर नाबालिग से कथित गैंगरेप की घटना ने महिला और बाल सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. परी चौक से कश्मीरी गेट तक करीब 47 किलोमीटर का सफर तय करने वाली बस रात के दौरान कई प्रमुख इलाकों और अलग-अलग थाना क्षेत्रों से होकर गुजरी, लेकिन रास्ते में बस की जांच या संदिग्ध गतिविधियों की पहचान न होने को लेकर पुलिस पेट्रोलिंग पर सवाल उठ रहे हैं. मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी संज्ञान लेते हुए अधिकारियों को नोटिस जारी किया है.
47 KM तक बस चलती रही, पुलिस क्या कर रही थी
बेंगलुरु की महिला अधिकार कार्यकर्ता ब्रिंदा अडिगे ने इस घटना को बेहद चिंताजनक बताते हुए कानून के डर और सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए. उन्होंने पूछा कि जब बस इतनी लंबी दूरी तक चलती रही तो पुलिस की पेट्रोलिंग आखिर कहां थी. उन्होंने बस में CCTV कैमरों की मौजूदगी और उनकी निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठाए. साथ ही बस मालिक की जिम्मेदारी को लेकर भी चिंता जताई और कहा कि ड्राइवर और कंडक्टर को ऐसी गंभीर वारदात के बाद बच निकलने का भरोसा आखिर कैसे हुआ.
47 किलोमीटर का सफर, लेकिन रास्ते में चेकिंग कहां थी
परी चौक से निकलने के बाद बस नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे, महामाया क्षेत्र, चिल्ला बॉर्डर, मयूर विहार और गीता कॉलोनी जैसे प्रमुख इलाकों से होते हुए कश्मीरी गेट की ओर पहुंची. करीब 47 किलोमीटर लंबे इस रूट में बस अलग-अलग पुलिस थाना क्षेत्रों और महत्वपूर्ण एंट्री-एग्जिट प्वाइंट से होकर गुजरी. इसके बावजूद रात के दौरान बस की रैंडम चेकिंग क्यों नहीं हुई, यह बड़ा सवाल बन गया है. स्लीपर बस के बंद ढांचे और अंदर लगे पर्दों ने भी निगरानी व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ा दी है.
रात की पुलिस पेट्रोलिंग पर उठे गंभीर सवाल
घटना के दौरान बस लगातार सड़क पर चल रही थी. ऐसे में प्रमुख सड़कों, बॉर्डर क्षेत्रों और संवेदनशील इलाकों में पुलिस पेट्रोलिंग की सक्रियता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है. अब जांच के दौरान यह भी देखा जाएगा कि उस रात संबंधित रूट पर पुलिस की पेट्रोलिंग कितनी सक्रिय थी और क्या स्लीपर बसों या अन्य संदिग्ध वाहनों के लिए कोई विशेष चेकिंग अभियान चल रहा था. सबसे बड़ा सवाल यह है कि करीब 47 किलोमीटर तक चलने वाली बस रास्ते में किसी प्रभावी पुलिस जांच के दायरे में क्यों नहीं आई.
CCTV, GPS और पैनिक बटन की व्यवस्था भी घेरे में
मामले ने सार्वजनिक परिवहन में सुरक्षा के लिए इस्तेमाल होने वाले CCTV कैमरों, GPS ट्रैकिंग और पैनिक बटन की व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. अगर बस में ये उपकरण मौजूद थे तो घटना के दौरान कोई अलर्ट क्यों नहीं मिला, यह जांच का महत्वपूर्ण विषय है. सवाल यह भी है कि GPS सिस्टम केवल बस की लोकेशन दर्ज करने तक सीमित था या उसकी वास्तविक समय में निगरानी भी की जा रही थी. तकनीकी सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई सुनिश्चित करना है, लेकिन इस घटना ने उसकी जमीनी प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
स्लीपर बसों के डिजाइन पर NHRC की चिंता
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मामले का संज्ञान लेते हुए संबंधित अधिकारियों से जानकारी मांगी है. NHRC के सदस्य प्रियांक कानूनगो के अनुसार, बच्ची के पुनर्वास, सामाजिक जांच और देखभाल योजना से जुड़ी जानकारी भी तलब की गई है. उन्होंने यह भी कहा कि आयोग पिछले एक साल से स्लीपर कोच बसों में गलत पार्टीशन और ड्राइवर केबिन की संरचना को लेकर राज्य अधिकारियों को नोटिस देता रहा है. उनके मुताबिक, ऐसी व्यवस्थाएं Central Institute of Road Transport की गाइडलाइंस के उल्लंघन से जुड़ी हो सकती हैं और नियमों का सख्ती से पालन ऐसी घटनाओं की रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
सिर्फ आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं, सिस्टम की जवाबदेही भी सवालों में
ड्राइवर और कंडक्टर की गिरफ्तारी के बाद मामले की आपराधिक जांच जारी है, लेकिन यह घटना केवल आरोपियों की पहचान और गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रह गई है. अब पुलिस पेट्रोलिंग, रात में चलने वाली स्लीपर बसों की रैंडम चेकिंग, परिवहन विभाग की निगरानी और सुरक्षा उपकरणों की वास्तविक स्थिति पर भी जवाब मांगा जा रहा है. NHRC की कार्रवाई के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या इस मामले से देशभर में स्लीपर बसों की सुरक्षा व्यवस्था, उनके डिजाइन और यात्रियों की निगरानी के नियमों को लेकर कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं.
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