Sambalpur News: पत्थर से बने ब्लेड, सुई और चमड़ा छीलने के नुकीले औजार मिले, पाषाण युग का होने का अनुमान
Sambalpur News: संबलपुर के रेढ़ाखोल स्थित भीम मंडल पहाड़ी गुफा में एएसआइ की टीम ने खुदाई और सर्वे शुरू किया है.
Sambalpur News: संबलपुर जिला के रेढ़ाखोल की भीम मंडल की पहाड़ियों में रॉक पेंटिंग, कलाकृतियां और हथियार मिलने के बाद आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआइ) की टीम खुदाई और सर्वे के काम में जुटी है. एएसआइ की टीम यहां जमीन के नीचे से 15000 साल पुरानी इंसानी सभ्यता से जुड़ी खोज में जुटी है. रिसर्चर्स का अनुमान है कि यहां मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से पुरानी सभ्यता से जुड़े राज छिपे हो सकते हैं.
रॉक पेंटिंग, कलाकृतियां और हथियार पहले ही हुए थे बरामद
संबलपुर के रेढ़ाखोल अनुमंडल की भीम मंडल पहाड़ियों के एतिहासिक महत्व की वजह से यहां अक्सर रिसर्च की मांग होती रही है. इससे पहले संबलपुर गंगाधर मेहर यूनिवर्सिटी के हिस्ट्री डिपार्टमेंट और इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (आइएनटीएसीएच) की टीम रिसर्च कर चुकी है. अब एएसआइ की एक स्पेशल टीम ने रिसर्च शुरू की है और कुछ जरूरी जानकारी मिली है. एएसआइ, पुरी सर्कल की एक टीम ने यहां खुदाई और रिसर्च का काम शुरू कर दिया है. एएसआइ के ड्राफ्ट्स मैन पवित्र मोहन ने बताया कि खुदाई के पहले चरण के बाद पाषाण युग की इंसानी सभ्यता में इस्तेमाल होने वाली चीजें और हाथ से बने उपकरण मिले हैं. इस रिसर्च टीम में शामिल टेक्नीशियन, इंजीनियर और सर्वेयर खुदाई जारी रखे हुए हैं. इसके साथ ही सभी टेस्ट और रिसर्च का काम पूरा होने के बाद असली डेटा का पता चलेगा.
15,000 साल पुराना होने का प्रारंभिक अनुमान, कार्बन डेटिंग से होगी पुष्टि
पवित्र मोहन के अनुसार, खुदाई का काम अभी शुरुआती स्टेज में है. यह खुदाई और रिसर्च अगले दो महीने तक जारी रहेगी. शुरुआती स्टेज की खुदाई के बाद इस जगह से पत्थर से बने ब्लेड, सुई और चमड़ा छीलने के लिए पत्थर से बने नुकीले औजारों के टुकड़े मिले हैं. जिनके 15,000 साल पुराना होने का अंदाजा है. हालांकि इन सभी चीजों की कार्बन डेटिंग के बाद पता चलेगा कि ये कितनी पुरानी हैं. उन्होंने बताया कि ऐतिहासिक महत्व वाली जगहों पर बहुत खुदाई में बड़े उपकरणों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. इसे हाथ से खोदा जाता है. इस खुदाई के काम में कई छोटी मशीनें इस्तेमाल होती हैं. जिससे एक दिन में आधा से एक सेंटीमीटर तक ही खुदाई हो पाती है. डिजिटल उपकरणों का इस्तेमाल सिर्फ फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के लिए किया जाता है. ये जगहें रिसर्च के लिए बहुत जरूरी होती हैं और बड़ी मशीनों से खुदाई करने पर बहुत जरूरी सबूत खोने का खतरा रहता है. ऐसी बारीक खुदाई से बहुत जरूरी छोटी चीजें भी मिलती हैं.
पाषाण युग में लोग पत्थरों को तराशकर बनाते थे अलग-अलग औजार
आर्कियोलॉजिस्ट के मुताबिक ,उस समय के लोग अपने मनोरंजन के लिए तस्वीरें बनाते थे. वे पत्थरों को तराशकर अलग-अलग जगहों पर तस्वीरें भी बनाते थे. वे पेड़ की छाल और पत्तियों को आयरन ऑक्साइड के साथ मिलाकर नेचुरल रंग तैयार करते थे. वे आमतौर पर अपनी पेंटिंग में जंगल के प्राकृतिक माहौल के साथ अपनी जीवनशैली को दिखाते थे. यहां खुदाई के बाद मिले अवशेषों के आधार पर रिसर्चर्स का अनुमान है कि उस समय के लोगों ने लोहा, कांसा या तांबा जैसे मेटल का इस्तेमाल करना नहीं सीखा था. साथ ही वे मुख्य रूप से पत्थर से हाथ के अलग-अलग औजार बनाते थे. इसलिए उन्हें पाषाण युग के लोग कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.
भीम मंडल में हैं 45 से ज्यादा रॉक शेल्टर, कई रॉक पेंटिंग और शिलालेख
आर्कियोलॉजिस्ट पवित्र मोहन ने बताया कि इतिहास में मोहनजोदड़ो और हड़प्पा को प्राचीन सभ्यता बताया गया है. वे आदिम इंसानों की तुलना में एडवांस्ड सिस्टम का इस्तेमाल करना जानते थे. उनकी तुलना में रेढ़ाखोल अनुमंडल में खुदाई वाली जगह पर मिली सभ्यता साफ तौर पर बहुत पुरानी है. उन्होंने बताया कि आने वाले दिनों में पूरे जंगल में अलग-अलग जगहों पर रिसर्च की जायेगी. स्थानीय लोगों ने कहा कि आर्कियोलॉजिकल डिपार्टमेंट द्वारा भीम मंडल पहाड़ियों में की गयी रिसर्च से वे बहुत खुश हैं. इस जगह पर गंगाधर मेहर यूनिवर्सिटी के हिस्ट्री डिपार्टमेंट ने रिसर्च की थी. यूनिवर्सिटी के हिस्ट्री डिपार्टमेंट ने कहा कि भीम मंडल में 45 से ज्यादा रॉक शेल्टर या गुफाएं हैं, साथ ही कई रॉक पेंटिंग और शिलालेख भी हैं. इसलिए भीममंडल संघ के अध्यक्ष रमेश प्रसाद स्वांई और स्थानीय निवासियों ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से मांग की है कि इसे नेशनल हेरिटेज मॉन्यूमेंट का दर्जा दिया जाये.
इलाके को पर्यटन स्थल का दर्जा दिलाने की कोशिशें होंगी सफल
नाकटिदेुल ब्लॉक के एबीडीओ विद्याधर राउतराय ने कहा कि यह एक पुराना घाटी वाला इलाका है. स्थानीय लोगों का मानना है कि यह महाभारत काल का है. अब आर्कियोलॉजिकल डिपार्टमेंट के अधिकारी यहां रिसर्च और खुदाई कर रहे हैं. उम्मीद है कि इस इलाके को टूरिस्ट डेस्टिनेशन का दर्जा दिलाने के लिए केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की कोशिशें सफल होंगी. वहीं, घुसुरामाल ग्राम पंचायत समिति सदस्य सुदर्शन साहू ने कहा कि अगर इस जगह को नेशनल हेरिटेज का दर्जा मिलता है, तो यहां बहुत सारे टूरिस्ट आयेंगे. इससे इस जगह को बचाने और इसे प्रमोट करने में मदद मिलेगी. जिससे स्थानीय लोगों को सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से फायदा होगा. एएसआइ के कार्य में नियोजित एक कारीगर अनिल स्वांई ने बताया कि अभी तक हमें यहां शिकार के लिए इस्तेमाल होने वाले पत्थर के ब्लेड, तीर, चाकू, भाले वगैरह के टुकड़े मिले हैं. ये ऐसी चीजें नहीं हैं, जिनका इस्तेमाल आज के इंसान करते हैं. ये बहुत पुरानी लगती हैं.
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