ओडिशा के जंगल में कहां से आए 5 वनमानुष? भारत में क्यों नहीं मिलते ओरंगुटान, जानिए पूरी कहानी

ओडिशा के बालासोर के जंगल में पांच वनमानुष मिलने से वन विभाग भी हैरान है, क्योंकि ये भारत की प्राकृतिक प्रजाति नहीं हैं. दक्षिण-पूर्व एशिया के जंगलों में पाए जाने वाले ये दुर्लभ वनमानुष भारत तक कैसे पहुंचे और क्या इसके पीछे वन्यजीव तस्करी का कनेक्शन है?

ओडिशा के बालासोर जिले के भोगराई इलाके में उस वक्त हड़कंप मच गया, जब ग्रामीणों ने जंगल में पेड़ों पर झूलते हुए 5 वनमानुष (ओरंगुटान)को देखा. देखते ही देखते इनकी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे. सूचना मिलने के बाद वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और सभी पांचों वनमानुष को सुरक्षित रेस्क्यू कर लिया.

पांचों वनमानुष भारत के नहीं, फिर ओडिशा कैसे पहुंचे?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि दक्षिण-पूर्व एशिया के जंगलों में पाए जाने वाले ये जानवर ओडिशा तक कैसे पहुंचे. ओरंगुटान भारत की प्राकृतिक वन्यजीव प्रजाति नहीं है. इनका प्राकृतिक आवास इंडोनेशिया के बोर्नियो और सुमात्रा द्वीपों तथा मलेशिया के कुछ हिस्सों में है. इनके प्राकृतिक ठिकाने भारत से करीब 4,000 किलोमीटर दूर हैं.

प्राकृतिक रूप से भारत पहुंचना लगभग नामुमकिन

विशेषज्ञों के मुताबिक, ओरंगुटान का अपने प्राकृतिक आवास से निकलकर अपने दम पर ओडिशा पहुंचना बेहद असंभव है. भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच ऐसा कोई प्राकृतिक स्थल मार्ग भी नहीं है, जिससे ये जानवर जंगलों के रास्ते यहां तक पहुंच सकें. यही वजह है कि वन विभाग अब इनके भारत पहुंचने के पीछे इंसानी भूमिका की जांच कर रहा है.

क्या अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव तस्करी से जुड़ा है मामला?

वन विभाग को शक है कि ये ओरंगुटान अवैध तस्करी का शिकार हो सकते हैं. हालांकि, अभी तक कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला है कि तस्करों ने ही इन्हें यहां छोड़ा है. जांच में यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इन्हें भारत में किस रास्ते से लाया गया और जंगल में किसने छोड़ा. राज्य सरकार ने मामले की जांच के लिए वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) से भी मदद मांगी है.

ओरंगुटान को क्यों कहा जाता है वनमानुष?

ओरंगुटान को हिंदी में आमतौर पर 'वनमानुष' कहा जाता है. ये इंसानों के सबसे करीबी रिश्तेदारों में शामिल बड़े कपि यानी ग्रेट एप्स हैं. इनके लंबे हाथ, लाल-भूरे बाल और पेड़ों पर रहने की खास क्षमता इन्हें दूसरे बंदरों से अलग बनाती है. ये अपना अधिकांश जीवन पेड़ों पर बिताते हैं और जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र में बीज फैलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

भारत में प्राकृतिक रूप से क्यों नहीं मिलते?

भारत में वनमानुष (ओरंगुटान )का प्राकृतिक आवास नहीं है. भारत में बंदरों और अन्य प्राइमेट्स की कई प्रजातियां पाई जाती हैं, लेकिन ओरंगुटान उनमें शामिल नहीं है. इसका कारण मुख्य रूप से इसका प्राकृतिक विकास और आवास क्षेत्र है, जो दक्षिण-पूर्व एशिया के उष्णकटिबंधीय वर्षावनों तक सीमित रहा है. इसलिए ओडिशा के जंगल में इनका मिलना सामान्य वन्यजीव घटना नहीं, बल्कि बेहद असामान्य मामला है.

तीनों प्रजातियां गंभीर खतरे में

दुनिया में ओरंगुटान की तीन जीवित प्रजातियां मानी जाती हैं और तीनों गंभीर रूप से संकटग्रस्त श्रेणी में हैं. जंगलों की कटाई, आवास का लगातार कम होना और अवैध वन्यजीव व्यापार इनके अस्तित्व के लिए बड़े खतरे हैं. ऐसे में पांच युवा ओरंगुटानों का एक साथ भारत के जंगल में मिलना वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से भी गंभीर चिंता का विषय है. इन खूबसूरत जीवों के खोने का मतलब है हमारी धरती की जैव विविधता का एक अनमोल हिस्सा हमेशा के लिए मिट जाना.

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अब आगे क्या होगा?

रेस्क्यू किए गए पांचों ओरंगुटानों को फिलहाल वन विभाग की निगरानी में रखा गया है. उनके स्वास्थ्य की जांच की जा रही है और उन्हें उचित देखभाल के लिए नंदनकानन जूलॉजिकल पार्क ले जाने की तैयारी की जा रही है. इन दुर्लभ वनमानुषों का भारत में मिलना एक पहेली है, लेकिन वन विभाग और वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो की सक्रियता से उम्मीद है कि इस रहस्य का पर्दा उठेगा और भविष्य में ऐसे मामलों को रोकने में मदद मिलेगी.

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By सत्येन्द्र गिरि

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पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान उन्होंने समाचार लेखन, डिजिटल मीडिया, रिपोर्टिंग और समसामयिक विषयों की गहन समझ विकसित की. पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके पास एक वर्ष का पेशेवर अनुभव है. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत अमर उजाला के गोरखपुर एडिशन से की, जहां समाचार लेखन और रिपोर्टिंग की बारीकियों को नजदीक से सीखने और समझने का अवसर मिला. इसके बाद उन्होंने डिजिटल पत्रकारिता में कदम रखते हुए प्रभात खबर डिजिटल से जुड़कर देश-विदेश की महत्वपूर्ण खबरों को पाठकों तक पहुंचाने का कार्य शुरू किया.

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