झारसुगुड़ा: झारसुगुड़ा जिले में मछली का उत्पादन और मांग दोनों ही लगातार बढ़ रही है. जिले के जलाशयों, तालाबों और अन्य मीठे जलस्रोतों से बड़े पैमाने पर मछली उत्पादन हो रहा है. खासकर हीराकुद जलाशय जिले के मत्स्य उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. बावजूद इसके स्थानीय लोगों को अपने ही जिले की मछली पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पा रही है. जिले में मछली उत्पादन और डिमांड में अंतर होने के कारण जिलेवासियों को आंध्र प्रदेश से आने वाली मछलियों पर निर्भर रहना पड़ रहा है.
राज्य मत्स्य निदेशालय से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में झारसुगुड़ा जिले में कुल 14,523 मीट्रिक टन मछली का उत्पादन हुआ. वर्ष 2021-22 में यह उत्पादन 12,038 मीट्रिक टन और 2022-23 में 13,200 मीट्रिक टन था. जबकि वर्ष 2019-20 की तुलना में उत्पादन में करीब 49.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.
वहीं, जिले में प्रतिदिन मछली की औसत मांग करीब 30.6 टन का है. इस हिसाब से सालाना जरूरत लगभग 11,170 टन बैठती है. मांग से अधिक उत्पादन होने के बावजूद जिले की मछली दूसरे जिलों और राज्यों में भेजी जा रही है. खासकर स्वादिष्ट मानी जाने वाली हीराकुद की मछली की बाहरी क्षेत्रों में काफी डिमांड है. ट्रेन के जरिये भारी मात्रा में मछली बाहर भेजे जाने से
स्थानीय बाजार में प्रभावित हो रही है उपलब्धता
हीराकुद के झारसुगुड़ा क्षेत्र से वार्षिक 2530 टन मछली का हो रहा उत्पादन गत मार्च में विधानसभा में दिये गये एक जवाब के अनुसार, वर्ष 2021-22 से 2025-26 के बीच हीराकुद जलाशय से कुल 87,401.49 मीट्रिक टन मछली का उत्पादन हुआ. इसमें झारसुगुड़ा जिले के हिस्से से 12,648.99 मीट्रिक टन उत्पादन हुआ, जो कुल उत्पादन का करीब 14.5 प्रतिशत है. यानी झारसुगुड़ा के हिस्से से हर साल औसतन करीब 2530 टन मछली का उत्पादन होता है. नाबार्ड की एक पुरानी रिपोर्ट के अनुसार, जिले में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन मछली की उपलब्धता 45.86 ग्राम थी. 2025 में जिले की अनुमानित आबादी करीब 6.68 लाख होने के आधार पर प्रतिदिन मछली की मांग करीब 30.6 टन आंकी गयी है.
उत्पादन में आत्मनिर्भरता के बावजूद बाहर से जिले में मंगायी जा रहीं मछलियां
हीराकुद जलाशय में उत्पादन बढ़ाने के लिए केज फिश फार्मिंग को प्रोत्साहित किया जा रहा है और अब तक कुल 132 केज फिश फार्मिंग यूनिट स्थापित की गयी हैं. हालांकि, जिले में उत्पादित मछली में से कितनी स्थानीय बाजार में खपत होती है और कितनी बाहर भेजी जाती है, इसका कोई स्पष्ट सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. यही वजह है कि मछली उत्पादन में आत्मनिर्भर होने के बावजूद झारसुगुड़ा को आंध्र प्रदेश की ही मछलियों पर निर्भर रहना पड़ रहा हैं.
