झारखंड में 27 नक्सलियों ने किया सरेंडर, मिसिर बेसरा समेत कई का आत्मसमर्पण अभी बाकी

Naxalite Surrender: झारखंड में 27 नक्सलियों के सरेंडर के बाद भी मिसिर बेसरा समेत कई शीर्ष माओवादी जंगलों में सक्रिय हैं. सारंडा और कोल्हान में सुरक्षा बलों का अभियान जारी है. पुलिस का दावा है कि जल्द ही क्षेत्र पूरी तरह नक्सलमुक्त हो सकता है. इससे जुड़ी खबर नीचे पढ़ें.

सारंडा से राधेश सिंह राज की रिपोर्ट

Naxalite Surrender: झारखंड के सारंडा, कोल्हान और पोड़ाहाट के जंगलों में नक्सलवाद अब अपने अंतिम दौर में पहुंचता दिखाई दे रहा है. गुरुवार 21 मई 2026 को रांची में 27 नक्सलियों के आत्मसमर्पण ने सुरक्षा एजेंसियों को बड़ी सफलता दिलाई है. हालांकि इसके बावजूद शीर्ष माओवादी नेता मिसिर बेसरा, असीम मंडल, अश्विन, अजय महतो और मोछू जैसे कई कुख्यात नक्सली अब भी जंगलों में सक्रिय बताए जा रहे हैं.

शीर्ष माओवादियों का सरेंडर अब भी बड़ी चुनौती

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार पहली पंक्ति के माओवादी नेताओं को आत्मसमर्पण के लिए तैयार करना अभी भी बेहद कठिन साबित हो रहा है. एक करोड़ के इनामी मिसिर बेसरा और उसके करीबी लड़ाके अब भी संगठन की विचारधारा से जुड़े हुए हैं. जानकार बताते हैं कि इन नेताओं पर सरकार की पुनर्वास नीति या प्रशासनिक प्रलोभनों का असर नहीं पड़ रहा है. यहां तक कि परिवार की भावनात्मक अपील भी उन्हें झुका नहीं पा रही है. यही कारण है कि मिसिर बेसरा जैसे शीर्ष माओवादी आत्मसमर्पण के पक्ष में नहीं दिख रहे हैं.

बेटे ने वीडियो जारी कर पिता से की थी अपील

भाकपा माओवादी संगठन के पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा को लेकर हाल के दिनों में एक भावुक मामला भी सामने आया था. उसके बेटे ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर पिता से मुख्यधारा में लौटने की अपील की थी. वीडियो में बेटे ने कहा था कि परिवार चाहता है कि मिसिर बेसरा अब घर लौट आए और बुढ़ापा परिवार के बीच बिताए. जानकारी के अनुसार मिसिर बेसरा के माओवादी बनने के बाद उसकी पत्नी घर छोड़ चुकी थी, जबकि बेटा संघर्ष कर पढ़ाई पूरी कर बाहर काम करने चला गया था. सूत्र बताते हैं कि बेटे ने कई बार सारंडा और कोल्हान के जंगलों में जाकर पूर्व नक्सलियों और समर्थकों के माध्यम से पिता तक संदेश पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन अब तक इसका कोई असर नहीं हुआ है.

आत्मसमर्पण के पक्ष में नहीं है मिसिर बेसरा

जानकारों का मानना है कि मिसिर बेसरा ने अपनी पूरी जिंदगी माओवादी संगठन को मजबूत करने में लगा दी. संभवतः इसी कारण वह आत्मसमर्पण को अपनी विचारधारा और संघर्ष के अंत के रूप में देखता है. बताया जाता है कि वह खुद को आने वाली पीढ़ियों के लिए नक्सल विचारधारा का प्रतीक बनाकर रखना चाहता है. वर्षों तक संगठन के लड़ाकों को पुलिस के सामने नहीं झुकने का संदेश देने वाले मिसिर के लिए आत्मसमर्पण करना उसके आत्मसम्मान से जुड़ा मुद्दा भी माना जा रहा है.

कई बड़ी घटनाओं में शामिल रहा है मिसिर

वर्ष 1990 में माओवादी संगठन से जुड़ा मिसिर बेसरा कई बड़ी घटनाओं में शामिल रहा है. वह संगठन की सेंट्रल कमिटी और पोलित ब्यूरो का सदस्य रह चुका है. इसके अलावा वह सेंट्रल मिलिट्री कमिशन का भी प्रमुख बताया जाता है. सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार वर्ष 2004 में 32 जवानों की हत्या की घटना में भी उसकी भूमिका रही थी. वर्ष 2007 में उसे रांची से गिरफ्तार किया गया था, लेकिन 2009 में बिहार के लखीसराय कोर्ट कॉम्प्लेक्स पर हुए माओवादी हमले के बाद वह फरार हो गया. वर्तमान में एनआईए भी उसके खिलाफ जांच कर रही है.

जनवरी मुठभेड़ के बाद बदला हालात

जानकार बताते हैं कि जनवरी 2026 में कई माओवादी संगठन आत्मसमर्पण की दिशा में बातचीत कर रहे थे. बताया जाता है कि कुछ नक्सलियों ने सुरक्षित सरेंडर के लिए संपर्क भी साधा था. लेकिन 22 और 23 जनवरी को सारंडा के कुमड़ीह इलाके में सुरक्षा बलों और एक करोड़ के इनामी अनल दा के दस्ते के बीच मुठभेड़ हो गई. इस कार्रवाई में सात महिला नक्सलियों समेत 17 उग्रवादी मारे गए. इसके बाद माओवादी संगठनों ने अपना रुख बदल लिया और फिर से जंगलों में सक्रिय हो गए.

सागेन अंगारिया के सरेंडर से मिली बड़ी सफलता

लगातार सुरक्षा दबाव और रसद नेटवर्क टूटने के बाद कई नक्सली संगठन कमजोर पड़ते गए. इसी दौरान पोड़ाहाट और गोइलकेरा क्षेत्र में सक्रिय सागेन अंगारिया उर्फ दोकोल अपने दस्ते के साथ पुलिस के संपर्क में आया. रमेश चंपिया की हत्या और इजरायल पूर्ति उर्फ अमृत के मारे जाने के बाद सागेन के दस्ते ने आत्मसमर्पण का फैसला लिया. सागेन पर अकेले 123 मामले दर्ज बताए जाते हैं. उसके अलावा गादी मुण्डा उर्फ गुलशन और नागेंद्र मुण्डा उर्फ प्रभात मुण्डा जैसे इनामी माओवादियों ने भी हथियार छोड़ दिए.

इसे भी पढ़ें: सिर्फ 10 साल की उम्र में नक्सली बन गया था करण उर्फ डांगुर, पूरी कहानी जानें पिता की जुबानी

क्या सारंडा पूरी तरह नक्सलमुक्त हो पाएगा?

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार अभी भी सारंडा और पोड़ाहाट के जंगलों में करीब 28 नक्सलियों के सक्रिय होने की सूचना है. हालांकि हजारों सुरक्षा बल लगातार अभियान चला रहे हैं और मंकी रिजर्व फॉरेस्ट जैसे इलाकों को सीलबंद कर रसद आपूर्ति पर रोक लगाई गई है. पुलिस अधिकारियों का मानना है कि अब नक्सलियों के सामने दो ही रास्ते बचे हैं. या तो वे आत्मसमर्पण करें या फिर मुठभेड़ का सामना करें. हालांकि जानकार यह भी मानते हैं कि केवल नक्सलियों के खात्मे से समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं होगी. सरकार और प्रशासन को क्षेत्र में शिक्षा, रोजगार, सड़क, स्वास्थ्य और जनकल्याणकारी योजनाओं को मजबूत करना होगा, ताकि भविष्य में कोई युवा फिर से हिंसा की राह पर न जाए.

इसे भी पढ़ें: सारंडा के जंगल में पैदा हुए कई कुख्यात नक्सली, सागोन आंगारिया सबसे खतरनाक कमांडर

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Published by: KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >