नोवामुंडी : रोजगार के लिए सैकड़ों युवकों का पलायन

ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार सृजन नहीं होने से बढ़ी परेशानी कई घरों में सिर्फ महिलाएं ही बचीं, पुरुष गये बाहर उप प्रमुख के गांव व पंचायत कोटगढ़ से सर्वाधिक पलायन नोवामंडी : ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन नहीं होने से युवक दूसरे राज्यों में पलायन कर रहे हैं. ज्यादातर युवक चेन्नई, बेंगलुरु, ओड़िशा समेत अन्य […]

ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार सृजन नहीं होने से बढ़ी परेशानी

कई घरों में सिर्फ महिलाएं ही बचीं, पुरुष गये बाहर
उप प्रमुख के गांव व पंचायत कोटगढ़ से सर्वाधिक पलायन
नोवामंडी : ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन नहीं होने से युवक दूसरे राज्यों में पलायन कर रहे हैं. ज्यादातर युवक चेन्नई, बेंगलुरु, ओड़िशा समेत अन्य राज्यों में मजदूरी की तलाश में जा रहे हैं. नोवामुंडी प्रखंड उप प्रमुख के गांव व पंचायत कोटगढ़ से सर्वाधिक पलायन हुआ है. कई घरों में केवल महिलाएं रह गयी हैं. कोटगढ़, कातिकोड़ा, टोंटोपोशी समेत दर्जनों गांव के युवक शामिल हैं. इसमें कातिकोड़ा के धनु लागुरी, टोंटोपोसी डेलर चांपिया, टोके सिंकु कोटगढ़ के गोरांग नायक, कार्तिक नायक, मनोज चौहान, पितबास नायक, घनश्याम नायक, वृंदावन नायक, रंजीत नायक, कांका चौहान, श्रीकृष्णा नायक,
सोनाराम नायक, डॉक्टर नायक, गुरदयाल लोहार, अमित प्रधान, मिथुन नायक, बीरचंद, परमेश्वर नायक समेत अनेक नाम शामिल है. मनरेगा में जितनी कमाई नहीं, उतनी गवांनी पड़ती है. श्री माझी ने कहा कि मनरेगा में समय पर मजदूरों को भुगतान नहीं होता है. सप्ताह भर काम कीजिये. बैंक से रुपये निकालने के लिए 30-40 किमी दूरी तयकर नोवामुंडी स्थित बैंक जाना पड़ता है. यहां कभी लिंक फेल, तो कभी लंबी कतार के कारण पैसा नहीं मिल पाता है. छह दिन काम कीजिये और चार दिन मजदूरी के लिए बैंक दौड़ें. इस संबंध में प्रखंड कार्यक्रम पदाधिकारी निरंजन मुखी ने कहा कि मनरेगा योजनाएं चलायी जा रही हैं. डोभा पर मुख्य रूप से फोकस किया गया है. स्वनियोजन के लिए एक भी योजना क्रियान्वयन नहीं हो सका है. पोखरपी, दुधबिला, दीरिबुरु, बड़ापासेया पंचायत में स्वनियोजन के लिए योजनाएं चालू की गयी थी, लेकिन वरीय अधिकारियों के निर्देश पर निर्माण कार्य बंद कर दिया गया.
स्वनियोजन की एक योजना नहीं मिली, पलायन मजबूरी : बाबूलाल
इस संबंध में प्रखंड बीस सूत्री अध्यक्ष बाबूलाल माझी का कहना है कि नोवामुंडी प्रखंड में बेरोजगारों के स्वनियोजन के लिए एक भी योजना क्रियान्वयन नहीं हो सका. सिर्फ डोभा पर हाय-तौबा मचा है. बकरी पालन, सूकर पालन, मुर्गी पालन समेत अनेक योजनाएं केवल कागजों पर है.

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