पैर नहीं, पढ़ाई के लिए रोज तय करती है 51 किमी की दूरी

दोनों पैरों से नि:शक्त, पर आसमान नापने का जज्बा है सुलता पाल में – राजन सिंह – चाकुलिया : चाकुलिया प्रखंड के कांटाबनी गांव की सुलता पाल दोनों पैरों से नि:शक्त है. अपने दो हाथों के बल वह चलती है. इस कमी के बावजूद उसमें कुछ कर गुजरने का जजबा है. शिक्षा प्राप्त करने की […]

दोनों पैरों से नि:शक्त, पर आसमान

नापने का जज्बा है सुलता पाल में

– राजन सिंह –

चाकुलिया : चाकुलिया प्रखंड के कांटाबनी गांव की सुलता पाल दोनों पैरों से नि:शक्त है. अपने दो हाथों के बल वह चलती है. इस कमी के बावजूद उसमें कुछ कर गुजरने का जजबा है. शिक्षा प्राप्त करने की ललक है. वह पढ़ लिख कर शिक्षिका बनना चाहती है. वह घाटशिला कॉलेज में बीए पार्ट वन में पढ़ रही है. लेकिन यह उसके लिए आसान नहीं है.

वह अपने गांव से लंबी दूरी हाथों के बल तय कर जोड़ाम पहुंचती है. यहां से किसी वाहन से चाकुलिया स्टेशन आती है और यहां से वह ट्रेन से घाटशिला अपने कॉलेज पहुंचती है. इस दौरान वह रोज 51 किमी की दूरी तय करती है.

इस संघर्ष में उसे सरकार से बस इतनी ही अपेक्षा है कि उसे एक अदद ट्राइ साइकिल मिल जाये, पर असंवेदनशील प्रशासन की तरफ से उसे इतनी मदद भी नहीं मिली.

सुलता पाल बताती है कि उसे सरकार की ओर से 400 रुपये का विकलांग भत्ता तो मिलता है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी उसके लिए ट्राइ साइकिल है. वह कहती है कि एक ट्राइ साइकिल मिल जाती तो उसे चलने में सुविधा होती. उसने केंदाडांगरी हाई स्कूल से द्वितीय श्रेणी से मैट्रिक पास की है.

मामा घर में रहती है सुलता

सुलता पाल जन्म से ही दोनों पांव से विकलांग है. उसके पिता उसकी मां के साथ नहीं रहते हैं. वह अपनी मां के साथ कांटाबनी स्थित अपने मामा के घर में रहती है. उसकी मां मजदूरी करती है और पढ़ाई में मदद करती है.पढ़ाई-लिखाई में उसके मामा भी मदद करते हैं.

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