आस्था, इतिहास और प्रकृति का संगम है आलिंगुड जतरा टोंगरी

मकर संक्रांति पर लगता है मेला, पर्यटक स्थल के रूप में अपार संभावनाएं

बोलबा. प्रखंड मुख्यालय से लगभग चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित आलिंगुड जतरा टोंगरी धार्मिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल के रूप में अपनी पहचान रखता है. प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर यह क्षेत्र न केवल स्थानीय लोगों की गहरी आस्था का केंद्र है, बल्कि नववर्ष और पर्व-त्योहारों के अवसर पर दूर-दराज से आने वाले सैलानियों को भी आकर्षित करता है. प्रतिवर्ष 14 जनवरी को मकर संक्रांति के अवसर पर यहां मेले का आयोजन किया जाता है. मेले की शुरुआत भगवान ओंकारेश्वर की विधिवत पूजा-अर्चना से होती है. इसके बाद पारंपरिक पैंकी नृत्य और झूमर नृत्य का आयोजन किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण व श्रद्धालु भाग लेते हैं.

त्रेता युग से जुड़ी है धार्मिक मान्यता

ग्रामीणों के अनुसार जतरा टोंगरी की धार्मिक महत्ता त्रेता युग से जुड़ी हुई है. मान्यता है कि उस काल में देवी-देवताओं द्वारा यहां जतरा (धार्मिक आयोजन) किया गया था, जिसमें भगवान शिव की पूजा और महाप्रसाद का वितरण हुआ था. बताया जाता है कि प्रसाद वितरण के चिह्न आज भी यहां की चट्टानों पर प्रतिबिंब के रूप में देखे जा सकते हैं. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस अनुष्ठान में बासुकीनाथ की उपस्थिति के प्रतीक स्वरूप चट्टानों पर दो सांपों के निशान भी मौजूद थे, जो प्राकृतिक आपदा के कारण मिट गये. हालांकि प्रसाद वितरण से जुड़े चिह्न आज भी स्पष्ट रूप से दिखायी देते हैं.

गुफाओं और चट्टानों से घिरा रहस्यमयी क्षेत्र

यह स्थल लगभग छह से आठ एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है. यहां सपाट चट्टानों के बीच कई प्राकृतिक गुफाएं मौजूद हैं. कहा जाता है कि इन गुफाओं में प्रवेश करने पर अलग-अलग प्रकार की ध्वनियां सुनायी देती हैं. प्राचीन काल में यहां बड़े-बड़े साधु-मुनि तपस्या किया करते थे. कुछ गुफाएं ऐसी हैं, जिनमें एक ओर से प्रवेश कर दूसरी ओर से बाहर निकला जा सकता है.

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By Prabhat Khabar News Desk

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