आस्था व श्रद्धा का प्रतीक है अर्जुनेश्वर धाम

बानो व रनिया प्रखंड के सीमावर्ती क्षेत्र सोदे में स्थित अर्जुनेश्वर धाम आस्था व श्रद्धा का प्रतीक है.

फोटो फाइल: 3 एसआइएम:10-अर्जुनेश्वर धाम धर्मवीर सिंह बानो. बानो व रनिया प्रखंड के सीमावर्ती क्षेत्र सोदे में स्थित अर्जुनेश्वर धाम आस्था व श्रद्धा का प्रतीक है. बानो प्रखंड से लगभग 15 किलोमीटर तथा सोदे से आधा किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है अर्जुनेश्वर धाम. यहां की विशेषता है कि यहां एक विशाल अर्जुन वृक्ष की जड़ से एक प्राकृतिक स्वयंभू शिवलिंग प्रस्फुटित हुआ है. जिसे श्रद्धालु अर्जुनेश्वर बाबा के नाम से पूजते हैं. इस शिवलिंग की आकृति आकार में अन्य स्थलों की तुलना में काफी बड़ी प्रतीत होता है और इसे देखकर मन को असीम शांति की अनुभूति होती है. इस स्थान की भौगोलिक स्थिति भी अत्यंत आकर्षक है. धाम से दूर-दूर तक फैली कोयल नदी के साथ नदी से सटे विश्वविख्यात सारंडा जंगल की श्रृंखलाएं धाम की सुंदरता को बढ़ाती हैं. अर्जुनेश्वर धाम परिसर में श्रद्धालुओं के सहयोग से महाबली हनुमान एवं माता दुर्गा की प्रतिमाएं भी स्थापित कर भव्य मंदिर का निर्माण किया गया है. श्रद्धालुओं के रहने के लिए धर्मशाला का भी निर्माण किया गया है. शिवलिंग की जड़ पाताल लोक से जुड़ी मानी जाती है. मान्यता है कि वर्षों पूर्व एक व्यक्ति ने इस शिवलिंग की गहराई जानने के लिए खुदाई की, किंतु वह इसकी जड़ तक नहीं पहुंच सका. इसके पश्चात यह मान्यता प्रचलित हो गयी कि यह शिवलिंग पाताल लोक तक जुड़ा हुआ है. स्थानीय लोगों के अनुसार यह शिवलिंग कई सौ वर्ष पुराना है.श्रावण मास की प्रत्येक सोमवारी एवं महाशिवरात्रि के अवसर पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु झारखंड के विभिन्न जिलों से यहां पहुंचते हैं और पवित्र जल से शिवलिंग का अभिषेक कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. इस दौरान स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा विशाल भंडारा आयोजित कर श्रद्धालुओं की सेवा की जाती है. धाम के इतिहास में पोंड़का भगत का नाम विशेष रूप से लिया जाता है. जिन्होंने अपनी संपूर्ण उम्र अर्जुनेश्वर बाबा की सेवा में अर्पित कर दी.वह प्रतिदिन पूजा-पाठ करने के उपरांत गांव में घर-घर जाकर पुष्प और प्रसाद का वितरण करते थे. 110 वर्ष की आयु में उनका निधन कुछ वर्ष पूर्व हुआ. अर्जुनेश्वर शिवधाम की धार्मिक स्थल के रूप में पहचान है. प्रशासन पहल करे तो इस धाम को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है.

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Author: VIKASH NATH

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