गणतंत्र दिवस के साथ झारखंड में आज से चलेगा गुरुतंत्र, शिबू सोरेन को पद्मभूषण अवॉर्ड

Shibu Soren Padma Bhushan: गणतंत्र दिवस के मौके पर झारखंड के ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्मभूषण देने की घोषणा की गई है. यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि झारखंड आंदोलन, आदिवासी अस्मिता और सामाजिक न्याय के लंबे संघर्ष की पहचान है. गुरुजी ने महाजनी प्रथा, जमीन के अधिकार और अलग झारखंड राज्य के लिए दशकों तक आंदोलन चलाया. इस ऐतिहासिक फैसले से झारखंड में ‘गुरुतंत्र दिवस’ की भावना भी जुड़ गई है, जो नई पीढ़ी को संघर्ष की विरासत से जोड़ती है. नीचे पढ़ें पूरी रिपोर्ट...

Shibu Soren Padma Bhushan: आज गणतंत्र दिवस के उल्लास के साथ झारखंड की धरती पर एक अलग ही भावनात्मक गूंज सुनाई दे रही है. तिरंगे की शान, संविधान की गरिमा और लोकतंत्र के उत्सव के बीच आज झारखंड अपने दिशोम गुरु को नमन कर रहा है. भारत सरकार द्वारा उन्हें मरणोपरांत पद्मभूषण सम्मान दिए जाने की घोषणा केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि उस विचारधारा की स्वीकृति है, जिसने हाशिए पर खड़े समाज को आवाज दी. झारखंड में यह दिन “गुरुतंत्र दिवस” के रूप में भी याद किया जाएगा. उस गुरु के लिए, जिसने संघर्ष को साधना बनाया, जंगल, जमीन और जल की लड़ाई को जनआंदोलन में बदला और आदिवासी अस्मिता को राष्ट्रीय पहचान दिलाई. दिशोम गुरु को याद करते हुए आज प्रभात खबर के लिए पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास, झारखंड विधानसभा अध्यक्ष रबींद्रनाथ महतो और राज्य के पूर्व वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव ने रिपोर्ट लिखी है.

दिशोम गुरु आदिवासी समाज के बीच भारत रत्न थे और रहेंगे

“हम सबके प्रिय, सम्माननीय और आदरणीय बाबा साहेब दिशोम गुरुजी शिबू सोरेन जी को पद्मभूषण सम्मान देने की घोषणा के लिए झारखंड की समस्त जनता की ओर से मैं केंद्र सरकार को हार्दिक आभार और धन्यवाद देता हूं. दिशोम गुरुजी का जीवन राजनीतिक सीमाओं से कहीं परे, अनंत तक फैला हुआ है. उनका संपूर्ण जीवन समता, समावेशी और सामाजिक न्याय, अस्मिता, आदिवासी पहचान, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण तथा शोषित-वंचित वर्गों के हक और अधिकारों के लिए किए गए विराट संघर्ष का जीवंत साक्षी रहा है. यही वह संघर्ष था, जिसने दशकों की सामाजिक और राजनीतिक लड़ाई के बाद झारखंड को उसका अपना राज्य दिलाया और झारखंडवासियों को झारखंडी होने का गौरव प्रदान किया. झारखंड की जनता के हृदय और विचारों में ही नहीं, बल्कि लद्दाख से केरल तक और राजस्थान से असम तक देश के आदिवासी समाज के बीच भारत मां के सच्चे सपूत बाबा दिशोम गुरु शिबू सोरेन भारत रत्न थे, हैं और सदैव रहेंगे.”

  • हेमंत सोरेन, मुख्यमंत्री, झारखंड

सच्चे जननायक : सत्ता से ज्यादा गांवों के नजदीक रहे

“उस दौर में संसाधन सीमित थे और चुनौतियां अपार थीं। उस दौर में गुरुजी ने समाज को संगठित किया. गुरुजी का जनता से सीधा संवाद और उनकी समस्याओं को सुलझाने का मौलिक तरीका आज भी प्रासंगिक है. आज जब झारखंड विकास की नई ऊंचाइयों को छूने की कोशिश कर रहा है, तब शिबू सोरेन इसलिए याद आते हैं, क्योंकि उन्होंने उस दौर में आदिवासियों के स्वाभिमान को जगाया, जब वे महाजनी प्रथा की बेड़ियों में जकड़े हुए थे. वह इसलिए भी याद आते हैं, क्योंकि उन्होंने धान काटने के आंदोलनों से लेकर अलग राज्य की मिसाल तक, कभी भी जमीन से अपना नाता नहीं तोड़ा. उन्होंने सत्ता के गलियारों से ज्यादा समय गांवों की पगडंडियों पर बिताया है. यही बातें शिबू सोरेन जी को आम नेता से अलग ‘गुरुजी’ बनाती हैं. गुरुजी के मुख्यमंत्री काल में बतौर उपमुख्यमंत्री काम करने का सौभाग्य मुझे मिला. गुरुजी के साथ मेरा पिता-पुत्र का संबंध था. वे हक के साथ मुझे बुलाते थे. कई मुद्दों पर यहां तक कि घर की भी काफी बातें चाची रूपी सोरेन के साथ बैठकर किया करते थे. किस क्षेत्र में क्या काम करना है, इसे लेकर वे हमेशा सलाह देते थे. दिशोम गुरु हमेशा गरीब, आदिवासी, दलित का जीवन स्तर कैसे उठे, इसी पर चिंतन करते रहे.”

  • रघुवर दास, पूर्व मुख्यमंत्री, झारखंड

संवाद में माहिर : लोगों का मनोविज्ञान पकड़ते थे

“मैं झामुमो का राजनीतिक कार्यकर्ता था. एक बार गुरुजी से मिला, तो बार-बार मिलने और सुनने का मन करता था. हमेशा लगता था कि उनके समीप ही रहें. एक बार वे संताल परगना में भाषण दे रहे थे. झारखंड आंदोलन की बात कह रहे थे. झारखंड अलग राज्य क्यों चाहिए, यह समझा रहे थे. मैं भी वहां उनका भाषण सुनने पहुंचा. पहली बार उन्हें मंच पर देख रहा था. शिबू सोरेन बोले – ‘तुम लोग बीए-एमए पास हो, बेरोजगार हो. खुद अपने मां-बाप का खा रहे हो. अपनी पत्नी और बच्चों को भी उनका बोझा बना दिए हो। पूरा परिवार आश्रित हो गया है.’

गुरुजी भीड़ से संवाद में माहिर थे. उन्होंने पूछा – यहां कौन-कौन लोग हैं, जो बीए पास कर के भी बेरोजगार हैं. वे युवाओं का मानस टटोल रहे थे. फिर उन्होंने कहा – हमें तृतीय और चतुर्थ वर्ग की नौकरी नहीं मिल रही है. झारखंड अलग राज्य बस इसलिए चाहिए ताकि हम अपना हक ले सकें. यहां की नौकरी पर अपना अधिकार हो। हम घर-परिवार पर बोझ न बनें.

गुरुजी का यह संवाद युवाओं पर गजब का प्रभाव डाल गया. युवा जोश और जज्बे से भर गए. गुरुजी जानते थे कि अपनी माटी के लिए संघर्ष कैसे करना है, लोगों को कैसे गोलबंद करना है। वे पीड़ित से प्रेम करते थे.”

  • रबींद्रनाथ महतो, अध्यक्ष, झारखंड विधानसभा

सच्चे संगठक : गोली चली, तो खुद पहुंच गए

“शिबू सोरेन राजनेता नहीं, जननेता थे. वर्ष 1980 की बात है. मैं चाईबासा का एसपी था. सारंडा के गुवा में गोलीकांड हो गया था. 10 लोग और चार पुलिसकर्मी मारे गए थे. स्थानीय नेता इलाका छोड़कर भाग गए थे. हर तरफ पुलिस की घेराबंदी थी.

इसी दौरान शिबू सोरेन मेरे पास पहुंचे और बोले – एसपी साहब, खाना खिलाइए, मुझे सारंडा जाना है. मैंने पहले उन्हें खाना खिलाया और कहा अभी जाना सही नहीं होगा, लेकिन वे मानने वाले नहीं थे. वे बेहद साहसी थे. मैंने उनके लिए टैक्सी की व्यवस्था की. उनके साथ सूरज मंडल थे. वे गुवा के अंदर पैदल ही पहुंचे, लोगों से मिले, उनकी पीड़ा सुनी और आंदोलन को लेकर चर्चा की.”

  • रामेश्वर उरांव, पूर्व वित्त मंत्री, झारखंड

यह झारखंड और संघर्ष का सम्मान है

“केंद्र सरकार ने दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्मभूषण से सम्मानित करने की घोषणा की है. यह बड़ा सम्मान है – सिर्फ शिबू सोरेन का नहीं, बल्कि झारखंड की जनता का भी. उनके 40 साल के संघर्ष का सम्मान है. हालांकि, यह सवाल भी उठेगा कि गुरुजी इससे बड़े सम्मान के हकदार थे.

झारखंड विधानसभा भारत रत्न की मांग का प्रस्ताव पारित कर चुकी है. यह सम्मान झारखंड और देश की आदिवासी राजनीति पर भी असर डालेगा. गुरुजी को यह सम्मान पब्लिक अफेयर्स श्रेणी में मिला है. यह उनके सामाजिक आंदोलनों, महाजनी प्रथा के खिलाफ संघर्ष और जमीन पर अधिकार दिलाने की लड़ाई का सम्मान है.

झारखंड आंदोलन में जयपाल सिंह मुंडा, विनोद बिहारी महतो और एन.ई. होरो का भी बड़ा योगदान रहा है. आगे यह मुद्दा भी उठेगा कि उन्हें भी उचित सम्मान मिलना चाहिए.”

  • अनुज सिन्हा, वरिष्ठ पत्रकार

शिबू सोरेन से जुड़ी टाइमलाइन

  • 27.11.1957: शपतमा सोरेन की हत्या, महाजनी प्रथा के खिलाफ आंदोलन
  • 1963: रूपी सोरेन से विवाह
  • 04.02.1972: झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन
  • 1975: आपातकाल में गिरफ्तारी, धनबाद जेल
  • 1980: दुमका से लोकसभा चुनाव जीते
  • 07.08.1995: झारखंड क्षेत्र स्वायत्त परिषद का गठन
  • 15.11.2000: अलग झारखंड राज्य का गठन
  • 23.05.2004: केंद्र सरकार में मंत्री
  • 03.03.2005: पहली बार झारखंड के मुख्यमंत्री
  • 15.04.2025: झामुमो संरक्षक बने

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झारखंड की इन हस्तियों को भी मिला पद्मभूषण

  • शैलेश कुमार बनोपाध्याय (2010): सामाजिक योगदान
  • महेंद्र सिंह धोनी (2018): खेल
  • कड़िया मुंडा (2019): सामाजिक व राजनीतिक योगदान

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लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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