Seraikela Kharsawan News : प्रभु जगन्नाथ, बलभद्र व देवी सुभद्रा का भव्य श्रृंगार, भोग लगे

गुंडिचा मंदिरों में प्रभु जगन्नाथ की पूजा, दर्शन के लिए जुटी भक्तों की भीड़

खरसावां. खरसावां व हरिभंजा का गुंडिचा मंदिरों में प्रभु जगन्नाथ, बलभद्र व देवी सुभद्रा के दर्शन के लिए रोजाना भक्तों की भीड़ उमड़ रही है. सुबह व शाम को प्रभु की आरती उतारने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं. तीनों ही विग्रहों का शृंगार किया जा रहा है. हरिभंजा के गुंडिचा मंदिर में प्रभु जगन्नाथ को विशेष रूप से ओड़िया व्यंजनों का भोग लगाया जा रहा है. भगवान जगन्नाथ को पोड़ा पीठा, मंडा पीठा, चितऊ पीठा, छेना पोड़ा समेत खाजा व फल-मूल के भोग चढ़ाये जा रहे हैं. साथ जिले के लड्डू का भी भोग चढ़ाया जा रहा है. खरसावां के गुंडिचा मंदिर में लोगों में खीर, खिचड़ी व सब्जी के प्रसाद का भी वितरण किया जा रहा है.

बाहुड़ा रथयात्रा कल

खरसावां व हरिभंजा में पांच जुलाई को प्रभु जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र व देवी सुभद्रा के साथ गुंडिचा मंदिर से श्रीमंदिर के लिए रथ पर सवार होकर रवाना होंगे. इसे बाहुड़ा रथयात्रा कहा जाता है. इसी के साथ प्रभु जगन्नाथ की वार्षिक रथयात्रा संपन्न होगी.

रथ मेला में उमड़ रही भीड़

सरायकेला के गुंडिचा मंदिर के पास आयोजित रथयात्रा मेला में बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ उमड़ रही है. रथयात्रा पर आयोजित मौसीबाड़ी मेला काफी पुरानी है. मेला में बिजली का झूला से लेकर अन्य मनोरंजन के साधन उपलब्ध हैं. मेला में पहुंचने वाले लोग झूला का लुत्फ उठा रहे हैं.

जुआ से दूर रहने व भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ने का दिया जा रहा संदेश

रथ मेला परिसर में अलग-अलग प्रतिमाएं स्थापित की गयी हैं. इन प्रतिमाओं के जरिये गरुड़ पुराण के साथ दो युगों की झलकियों को मूर्त रूप दिया गया है. मूर्तिकारों ने द्वापर युग के अंतिम चरण महाभारत काल और कलयुग के प्रथम चरण के भक्तों को मूर्त रूप दिया है. इसमें द्वापर युग में महाभारत का कारण द्यूत क्रीड़ा (जुआ खेल) और द्रौपदी चीरहरण को दर्शाया गया है, जो महाभारत जैसे युद्ध का कारण बना था. मूर्तिकारों ने कलयुग की शुरुआत में जन्मे चैतन्य महाप्रभु, मीराबाई, संत श्री तुकाराम एवं श्री हरिदास जैसे भक्तों की मूरत को जीवंत रूप दिया है. इसके जरिए जुआ से होने वाली क्षति के साथ ही समाज को भक्ति भाव से जीवन जीने का संदेश दिया है.

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Author: ATUL PATHAK

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