खरसावां: झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले के खरसावां एवं कुचाई प्रखंड के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में सर्पों की देवी मां मनसा की पूजा-अर्चना पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न हुई. इस पावन अवसर पर पारंपरिक अनुष्ठानों की शुरुआत जलाशयों से भव्य कलश यात्रा निकालकर की गयी. इसके बाद क्षेत्र के विभिन्न मनसा पीठों पर कलश स्थापना के साथ मां मनसा की प्रतिमा स्थापित की गयी और विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की गयी.
खरसावां के गांगुडीह, बिटापुर, सोखनडीह, डांगलटांड और कृष्णापुर समेत कई गांवों में श्रद्धालुओं ने बढ़-चढ़कर मां मनसा की आराधना की. पूजा स्थलों पर दिनभर भक्तों का तांता लगा रहा. कई स्थानों पर विशेष भंडारे का आयोजन किया गया, जहां प्रसाद ग्रहण करने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे. ग्रामीणों की अटूट मान्यता है कि मां मनसा की पूजा करने से परिवार को सर्पदंश और अन्य विषैले जीवों के प्रकोप से सुरक्षा मिलती है. श्रद्धालुओं ने मां से परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और सभी मनोकामनाओं की पूर्णता की प्रार्थना की.
सांप-बिच्छुओं के प्रकोप से रक्षा की कामना
सावन-भादो के महीने में होने वाली बारिश के चलते खेतों में हरियाली छा जाती है और मिट्टी में नमी बढ़ जाती है. इस मौसम में गांवों की पगडंडियों, झाड़ियों, खेतों और घरों के आसपास सांप-बिच्छुओं की आवाजाही स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है. ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में मां मनसा की यह पूजा धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्रकृति और ग्रामीण जीवन के बीच के सदियों पुराने गहरे संबंध को दर्शाती है.
खेतों में दिन-रात पसीना बहाने वाले किसानों तथा जंगल-पहाड़ के करीब रहने वाले ग्रामीणों के लिए मां मनसा की यह आराधना विशेष महत्व रखती है. ग्रामीणों ने मां विषहरि से न केवल अपने परिवार और पूरे समाज की रक्षा की गुहार लगाई, बल्कि खेतों में अच्छी फसल की भी कामना की.
आधुनिकता के दौर में भी जीवंत है परंपरा
सरायकेला-खरसावां क्षेत्र में मनसा पूजा आज भी ग्रामीण संस्कृति और लोकसंस्कृति की एक जीवंत कड़ी बनी हुई है. आज के आधुनिक दौर और बदलती जीवनशैली के बीच भी इस प्राचीन पर्व की परंपरा पूरी तन्मयता से कायम है.
मां मनसा के प्रति समर्पण भाव में सुरक्षा और सुख-समृद्धि की कामना तो जुड़ी ही है, साथ ही यह पर्व गांव की सामूहिकता, पारंपरिक लोकगीतों, रीति-रिवाजों और पीढ़ियों की साझी स्मृतियों को भी संजोए हुए है. बरसात की फुहारों के बीच होने वाली मनसा पूजा यह साबित करती है कि यह सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आस्था और प्रकृति के बीच के उस अटूट रिश्ते की कहानी है, जो पीढ़ियों से अनवरत चली आ रही है.
