खरसावां. खरसावां के हरिभंजा समेत विभिन्न जगन्नाथ मंदिरों में बुधवार की शाम 'चतुर्भुजो जगन्नाथ' जैसे वैदिक मंत्रोच्चार से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा. 'चितालागी अमावस्या' जिसे स्थानीय स्तर पर चितोऊ अमावस्या भी कहा जाता है. इस अवसर पर मंदिरों में प्रभु जगन्नाथ, बलभद्र व देवी सुभद्रा की विशेष पूजा-अर्चना होती है. पुरोहितों ने धार्मिक परंपराओं के अनुसार चतुर्धा मूर्ति के मस्तक पर चंदन का टीका लगाकर स्वर्ण आभूषण से सजाया जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार स्नान पूर्णिमा पर उतारे जाने वाले इस चिट्टा को सावन अमावस्या के दिन पुनः धारण कराया जाता है. इस दौरान ओडिया परंपरा के अनुसार चावल के पाउडर से तैयार विशेष 'चितऊ पीठा' का भोग वर्ष में केवल एक बार भगवान को अर्पित किया गया, जिसके दर्शन और प्रसाद ग्रहण करने के लिए मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी.
किसानों ने खेतों में की गंडेइसुनी और कस्तुरी की पूजा
यह पर्व केवल मंदिर की परंपराओं तक सीमित न रहकर स्थानीय कृषि संस्कृति का भी अनूठा संगम है. चितालागी अमावस्या पर किसानों ने अच्छी फसल की पैदावार और फसलों की सुरक्षा की कामना को लेकर खेतों में गंडेइसुनी यानी घोंघे तथा कस्तुरी की विधिवत पूजा की. बारिश के मौसम में धान की फसल को जीव-जंतुओं से बचाने की मान्यता के तहत किसानों ने सारू के पत्ते पर चितऊ पीठा खेतों में अर्पित किया. इस प्रकार खरसावां में यह पर्व धार्मिक आस्था, पारंपरिक उल्लास और कृषि संस्कृति के साथ मनाया गया.
