सरायकेला: सरायकेला की पहचान बन चुकी छऊ कला और पारंपरिक मुखौटा शिल्प को एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला है. सरायकेला के प्रसिद्ध छऊ मुखौटा शिल्पकार और गुरु सुशांत कुमार महापात्र को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया.
वर्ष 2024 और 2025 के लिए आयोजित विशेष अलंकरण समारोह में देशभर के 115 कलाकारों को संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और पुरस्कार प्रदान किए गए.
सम्मान मिलने के बाद गुरुओं को किया याद
पुरस्कार मिलने के बाद गुरु सुशांत महापात्र ने इस सम्मान को अपने गुरुओं को समर्पित किया. उन्होंने कहा कि सरायकेला की छऊ मुखौटा कला को आगे बढ़ाना ही उनके जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है. वह आगे भी इस कला के संरक्षण और संवर्धन के लिए काम करते रहेंगे.
8 साल की उम्र में शुरू किया था मुखौटा बनाना
गुरु सुशांत कुमार महापात्र का जन्म 10 दिसंबर 1952 को हुआ था. उन्हें यह कला विरासत में मिली. उनके बड़े पिताजी और प्रसिद्ध शिल्पकार गुरु प्रसन्न कुमार महापात्र ने करीब एक सदी पहले सरायकेला शैली के छऊ नृत्य में आधुनिक मुखौटा निर्माण की परंपरा की शुरुआत की थी.
इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सुशांत महापात्र ने महज 8 साल की उम्र में मुखौटा बनाना सीखना शुरू कर दिया. वर्ष 1972 से वह कार्यशालाओं और प्रदर्शनियों के माध्यम से इस कला को नई पहचान दिलाने में जुटे हैं.
अब तीसरी पीढ़ी भी संभाल रही है विरासत
गुरु सुशांत महापात्र की यह विरासत अब तीसरी पीढ़ी तक पहुंच चुकी है. उनके पुत्र सुमित महापात्र भी छऊ मुखौटा निर्माण के काम से जुड़े हुए हैं और इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं.
न्यूयॉर्क, बर्लिन और सियोल तक पहुंची यह कला
गुरु सुशांत महापात्र ने सरायकेला के छऊ मुखौटों को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वर्ष 1996 में उन्होंने अमेरिका के न्यूयॉर्क, जर्मनी के बर्लिन और ऑस्ट्रिया के वियना में आयोजित प्रदर्शनियों और कार्यशालाओं में हिस्सा लिया.
संगीत नाटक अकादमी के विशेष अनुरोध पर उन्होंने दक्षिण कोरिया के सियोल ओलंपिक के लिए भगवान श्रीकृष्ण और श्रीगणेश के मुखौटे तैयार किए थे.
वर्ष 2019 में उनके द्वारा तैयार किया गया भगवान श्रीकृष्ण का मुखौटा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी भेंट किया गया था. सरायकेला शैली के छऊ नृत्य में मुखौटों का विशेष महत्व है. यहां तैयार किए जाने वाले मुखौटे अपनी बारीक कारीगरी, रंगों के अनोखे संयोजन और पारंपरिक तकनीक के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध हैं.
सम्मानों से भरा रहा है सफर
गुरु सुशांत महापात्र को इससे पहले भी कई बड़े पुरस्कार मिल चुके हैं. उन्हें सिंहभूम शिल्प सम्मान, राज्य सांस्कृतिक सम्मान, छऊ गुरु सम्मान, श्रेष्ठ मुखौटा निर्माता सम्मान और कला श्री सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है. गुरु सुशांत महापात्र को मिला यह सम्मान सिर्फ उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है. यह सरायकेला की सदियों पुरानी छऊ परंपरा, मुखौटा शिल्प और उससे जुड़े कलाकारों की कई पीढ़ियों की मेहनत का सम्मान है. राष्ट्रपति के हाथों मिला यह सम्मान आने वाली पीढ़ियों को भी इस कला से जोड़ने का काम करेगा.
