छऊ नृत्य की पहचान है मुखौटा

सरायकेला/खरसावां : विश्व प्रसिद्ध छऊ नृत्य की विभिन्न शैलीयों में महत्वपूर्ण शैली है सरायकेला व मानभूम शैली के छऊ नृत्य. इन दोनों ही शैली के छऊ नृत्यों की विशेषता मुखौटा से है. मुखौटा के बगैर इन शौलीयों के छऊ नृत्य की कल्पना तक नहीं की जा सकती है. छऊ का मुखौटा बनना जितना कठिन है, […]

सरायकेला/खरसावां : विश्व प्रसिद्ध छऊ नृत्य की विभिन्न शैलीयों में महत्वपूर्ण शैली है सरायकेला व मानभूम शैली के छऊ नृत्य. इन दोनों ही शैली के छऊ नृत्यों की विशेषता मुखौटा से है. मुखौटा के बगैर इन शौलीयों के छऊ नृत्य की कल्पना तक नहीं की जा सकती है.
छऊ का मुखौटा बनना जितना कठिन है, उसे पहन कर नृत्य करना उससे भी अधिक कठिन कार्य है. दूसरे शैली के छऊ नृत्य में नर्तक के नृत्य सहित उसके नेत्र, मुख आदि की भाव भंगिमा तथा अभियन क्षमता को देखा जाता है, परंतु मानभूम व सरायकेला शैली की छऊ नृत्य में नर्तक नृत्य मुखौटे के सहारे नृत्य के चरित्र में समाहित होकर उसी अंदाज में नृत्य करता है. जानकार बताते है कि सरायकेला के प्रशन्न कुमार महापात्र ने इस शैली के छऊ नृत्य के लिए मुखौटा तैयार किया था. सरायकेला छऊ में मुखौटा को शामिल करने के बाद इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली. सरायकेला शैली में फिलहाल दर्जनों कलाकार मुखौटा तैयार करते है.
गीले मिट्टी से पेपर के साथ मुखौटा तैयार किया जाता है. मुखौटा सुखने के पश्चात इसमें शाीय व मार्गी रुप को ध्यान में रख चरित्र के अनुरुप रंग डाला जाता है. भगवान कृष्ण के शरीर का पितांबर रंग, मां दुर्गा का लाल, महिषासुर का हरा रंग होता है. मुखौटा के रंगाई के पश्चात चरित्र के अनुरुप ही मुकुट गहना आदि से सजाया जाता है. एक मुखौटा तैयार करने में आठ से दस दिन का समय लग जाता है. मुखौटा पर शोध करने के लिए हर वर्ष विदेशों से लोग आते है. मुखौटा पहनने के पश्चात नर्तक को सांस रोकने की अभ्यास करनी पड़ती है. मुखौटा पहन कर नृत्य करने के लिए भी महीनों अभ्यास करना होता है, तभी नर्तक मुखौटा पहन कर नृत्य कर सकता है. मुखौटा के बगैर विश्व प्रसिद्ध मानभूम व सरायकेला शैली के छऊ नृत्य की कल्पना तक नहीं की जा सकती है.
1908 से हो रही है भुरकूली में चड़क पूजा
सरायकेला. सरायकेला प्रखंड अंतर्गत भुरकुली में चैत पर्व के अवसर पर कई धार्मिक अनुष्ठानों के साथ आयोजित होने वाली चड़क पूजा आगामी 10 अप्रैल से 14 अप्रैल तक होगा. बताया जाता है कि वर्ष 1908 में यहां पर शिवलिंग का अविर्भाव हुआ था. इसके बाद से प्रति वर्ष भगवान विश्वनाथ महादेव की भक्ति भावना के साथ पूजा-अर्चना की जाती है.
10 अप्रैल को शुभघट स्थापित कर पूजा आरंभ होगी. 12 अप्रैल को अखाड़ा भाड़ा, 13 अप्रैल को भोक्ता उपवास रह कर शुभ यात्र घट, गरिया भार कालिका घट कार्यक्रम संपादित करेंगे. इसी दिन छऊ नृत्य का भी आयोजन होगा. अंतिम दिन 14 अप्रैल को संक्रांति के सूर्योदय के साथ देवों के देव महादेव को प्रसन्न करने के लिए भक्त जान को जोखिम में डाल कर कई आकर्षक करतब दिखाते हैं, जिसे हर कोई देख आश्चर्यचकित रह जाते हैं.
इस दैरान भक्त गांजा डांग, चड़क उड़ा पर्व, रजनी फुड़ा, जिव्हा बाण, अगिA पाट जैसे कई हैरतअंगेज करतब दिखाते हैं. देवता को प्रसन्न करने के लिए भक्त अपने पीठ में लोहे का हुक फंसा कर बैलगाड़ी या ट्रैक्टर खींचते हैं. इसके अलावा भक्त को हुक के सहारे 40 फिट ऊपर लटका दिया जाता है. इन्हीं आकर्षक करतबों को देखने के लिए दूर दराज से सैकड़ों की भीड़ उमड़ती है, जो मेले का रूप ले लेती है. कार्यक्रम व पूजा को सफल बनाने के लिए क्षेत्र व समिति के लोग प्रयासरत हैं.

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