केरल में साहिबगंज के चार नाबालिग बच्चों का रेस्क्यू, संदिग्ध व्यक्ति पकड़ाया

मानव तस्करी की आशंका को लेकर पुलिस और बाल संरक्षण एजेंसियां सतर्क हो गयी हैं. प्राप्त जानकारी के अनुसार, तिरुवनंतपुरम रेलवे पुलिस को स्टेशन परिसर में बच्चों की गतिविधियां संदिग्ध लगीं.

साहिबगंज. केरल के तिरुवनंतपुरम सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर साहिबगंज जिले के चार नाबालिग बच्चों को रेल पुलिस ने संदिग्ध परिस्थितियों में रेस्क्यू कर सुरक्षित संरक्षण में लिया है. रेस्क्यू किए गए बच्चों में दो लड़के और दो लड़कियां शामिल हैं. इस दौरान बच्चों के साथ मौजूद संदिग्ध व्यक्ति को भी हिरासत में लिया गया है, जो साहिबगंज जिले का ही निवासी बताया जा रहा है. घटना के बाद मानव तस्करी की आशंका को लेकर पुलिस और बाल संरक्षण एजेंसियां सतर्क हो गयी हैं. प्राप्त जानकारी के अनुसार, तिरुवनंतपुरम रेलवे पुलिस को स्टेशन परिसर में बच्चों की गतिविधियां संदिग्ध लगीं. पूछताछ के दौरान बच्चों के जवाब और उनके साथ मौजूद व्यक्ति की भूमिका पर संदेह होने के बाद पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए चारों बच्चों को सुरक्षित रेस्क्यू कर लिया. मामले को गंभीरता से लेते हुए रेलवे पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर संदिग्ध व्यक्ति को हिरासत में ले लिया है. बच्चों को बाल संरक्षण नियमों के तहत चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशन में सुरक्षित रखा गया है. घटना की सूचना तिरुवनंतपुरम पुलिस ने हेल्प डेस्क टीम को दी है. इसके बाद साहिबगंज पुलिस से समन्वय स्थापित कर बच्चों के परिजनों की पहचान की गयी. सूचना मिलते ही बच्चों के माता-पिता उन्हें वापस लाने के लिए केरल रवाना हो गये हैं. यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है. क्योंकि साहिबगंज और संथाल परगना क्षेत्र में पूर्व में भी मानव तस्करी के कई मामले सामने आते रहे हैं. गरीबी, अशिक्षा, रोजगार का अभाव और बेहतर जीवन का झांसा देकर बच्चों व किशोरियों को दूसरे राज्यों में ले जाने की घटनाएं समय-समय पर उजागर होती रही हैं. कई बार पुलिस, रेलवे सुरक्षा बल, एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट तथा बाल संरक्षण संस्थाओं की संयुक्त कार्रवाई में बड़ी संख्या में बच्चों और किशोरियों को रेस्क्यू किया गया है. इसके बावजूद तस्करी का नेटवर्क पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका है. विशेषज्ञों का मानना है कि मानव तस्कर अक्सर गरीब परिवारों को नौकरी, पढ़ाई या बेहतर भविष्य का सपना दिखाकर बच्चों को अपने जाल में फंसा लेते हैं. कई मामलों में बच्चों को घरेलू काम, बंधुआ मजदूरी, अवैध श्रम, भीख मंगवाने या अन्य शोषणकारी गतिविधियों में धकेल दिया जाता है. ऐसे मामलों का समाज और परिवारों पर गंभीर प्रभाव पड़ता है तथा बच्चों का बचपन, शिक्षा और भविष्य खतरे में पड़ जाता है. कानून के अनुसार मानव तस्करी एक गंभीर अपराध है. भारतीय न्याय संहिता और बाल संरक्षण से जुड़े विभिन्न कानूनों के तहत दोषी पाए जाने पर आरोपियों को कठोर कारावास और आर्थिक दंड का प्रावधान है. यदि मामले में नाबालिगों की तस्करी, शोषण या संगठित अपराध के तत्व सामने आते हैं, तो सजा और भी कठोर हो सकती है. कानून विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में त्वरित जांच, शीघ्र न्यायिक प्रक्रिया और दोषियों को कड़ी सजा मिलना आवश्यक है, ताकि तस्करी के नेटवर्क पर प्रभावी लगाम लगाई जा सके. सामाजिक संगठनों का कहना है कि केवल पुलिस कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि गांव-गांव में जागरूकता अभियान चलाना, स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की निगरानी, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर सतर्कता बढ़ाना तथा संदिग्ध गतिविधियों की तत्काल सूचना पुलिस को देना भी जरूरी है. अभिभावकों को भी बच्चों को अनजान लोगों के झांसे में न आने देने के लिए सतर्क रहने की आवश्यकता है. फिलहाल तिरुवनंतपुरम पुलिस मामले के सभी पहलुओं की जांच कर रही है. यह पता लगाया जा रहा है कि बच्चों को किस उद्देश्य से इतनी दूर ले जाया जा रहा था और इसके पीछे किसी बड़े नेटवर्क की भूमिका तो नहीं है. चारों बच्चों के सुरक्षित रेस्क्यू होने से उनके परिजनों ने राहत की सांस ली है. वहीं, पूरे मामले ने एक बार फिर मानव तस्करी की चुनौती और उससे निपटने की आवश्यकता को सामने ला दिया है.

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Author: RAKESH KUMAR

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