World Tribal Day: झारखंड की धरती के 5 'ग्लोबल आइकॉन', जिन्होंने विश्व में बढ़ाया भारत का मान

विश्व आदिवासी दिवस पर झारखंड के 5 प्रमुख जनजातीय नायकों के बारे में जानें. इन वीरों ने अपनी मेधा, साहस और संस्कृति से दुनिया भर में भारत का झंडा बुलंद किया है.

World Tribal Day, रांची : विश्व आदिवासी दिवस हमारी जड़ों, जल, जंगल, जमीन और उस पारंपरिक रिवाज को याद करने का दिन है, जो आज दुनिया को दिशा दिखा रही है. जब भी आदिवासियों के अस्तित्व और स्वाभिमान की बात होती है, तो झारखंड की माटी का जिक्र सबसे ऊपर होता है. अक्सर इस समाज को 'पिछड़ा' टैग लगाकर चिपका दिया जाता रहा है, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है. इसी माटी के आदिवासी नायकों ने अपनी मेधा, साहस और संस्कृति के दम पर न केवल भारत में, बल्कि विश्व के मंच पर झारखंड का झंडा बुलंद किया है. इस विश्व आदिवासी दिवस पर आइए जानते हैं झारखंड के उन 5 प्रमुख जनजातीय नायकों के बारे में, जिनके संघर्ष, खेल और कला की गूंज संयुक्त राष्ट्र से लेकर ओलंपिक और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मंचों तक सुनाई दी.

भगवान बिरसा मुंडा ने किया अंग्रेजों के खिलाफ उलगुलान

19वीं सदी के अंत में ब्रिटिश हुकूमत और ईस्ट इंडिया कंपनी के शोषण के खिलाफ 'उलगुलान' (महान विद्रोह) का नेतृत्व करने वाले बिरसा मुंडा आज दुनिया भर में अपनी जमीन के अधिकार लेने का प्रतीक बन चुके हैं. झारखंड के उलिहातू से उठी उनकी आवाज की गूंज आज भी संयुक्त राष्ट्र (UN) और दुनिया के विभिन्न महाद्वीपों में चल रहे स्वदेशी आंदोलनों में एक मिसाल के तौर पर सुनाई देती है. वे पूरी दुनिया में आदिवासी स्वायत्तता के सबसे बड़े ऐतिहासिक आइकॉन हैं.

जयपाल सिंह मुंडा ने दिलाया था भारत को पहला ओलंपिक स्वर्ण पदक

झारखंड की माटी का यह नायक न केवल संविधान सभा के सदस्य थे बल्कि वे 1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक्स में भारतीय हॉकी टीम के कप्तान भी थे. उनकी कप्तानी में भारत ने अपना पहला ओलंपिक स्वर्ण पदक जीता. इसके अलावा, भारतीय संविधान सभा में उन्होंने आदिवासियों की स्वायत्तता, जल-जंगल-जमीन के अधिकारों और स्वदेशी पहचान के लिए दुनिया के सामने सबसे मजबूत आवाज उठाई.

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डॉ. रामदयाल मुंडा बने यूएन में झारखंड के आवाज

रांची विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और प्रसिद्ध मानवशास्त्री डॉ. रामदयाल मुंडा ने झारखंडी संस्कृति और मुंडारी भाषा को अमेरिका की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी से लेकर संयुक्त राष्ट्र (UN) के जेनेवा स्थित मंचों तक पहुंचाया. उन्होंने वैश्विक सम्मेलनों में भारत के आदिवासियों का प्रतिनिधित्व किया और पश्चिमी दुनिया को बताया कि आदिवासी दर्शन और जीवनशैली किस तरह प्रकृति के साथ सबसे गहरा संतुलन बनाते हैं.

दयामनी बारला को मिला अंतरराष्ट्रीय सम्मान

जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए ग्लोबल कॉरपोरेट दिग्गज 'आर्सेलरमित्तल' के स्टील प्रोजेक्ट के खिलाफ अहिंसक जन-आंदोलन का सफलता पूर्वक नेतृत्व करने वाली दयामनी बारला ने दुनिया भर के पर्यावरणविदों का ध्यान खींचा. उन्हें अमेरिका स्थित संस्था द्वारा प्रतिष्ठित 'एलन लुट्ज इंडिजिनियस राइट्स पुरस्कार' से सम्मानित किया गया. उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में स्वदेशी अधिकारों की बेबाक आवाज उठाई है और दुनिया को दिखाया है कि जमीन से जुड़ाव क्या होता है.

निक्की प्रधान- ओलंपिक खेलने वाली झारखंड की पहली बेटी

खूंटी के एक छोटे से गांव हेसेल से निकलकर जब निक्की प्रधान 2016 रियो ओलंपिक और फिर 2020 टोक्यो ओलंपिक के मैदान पर उतरीं, तो उन्होंने इतिहास रच दिया. वे ओलंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली झारखंड की पहली महिला आदिवासी खिलाड़ी बनीं. अंतरराष्ट्रीय हॉकी में उनके शानदार खेल ने पूरी दुनिया को झारखंड के आदिवासी युवाओं की खेल प्रतिभा का लोहा मनवाया.

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लेखक के बारे में

By समीर उरांव

इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.

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