रांची, अभिषेक रॉय : रांची के रातू रोड के रहने वाले विशाल जायसवाल पहले कंस्ट्रक्शन बिजनेस से जुड़े थे. कोरोना काल में काम बंद हुआ, तो पारंपरिक खेती को स्टार्टअप बनाया. उन्होंने मुंबई के ‘नंदी ग्रीन सॉल्यूशन’ से जैविक (ऑर्गेनिंग) खेती की जानकारी हासिल की. जनवरी 2021 में लॉकडाउन से छूट मिलने के दौरान रांची से 41.5 किमी दूर कुंजला, खूंटी के पेलोल डैम के निकट ‘मृद फार्म’ सब्जियों की खेती शुरू की.
शुरुआती स्तर पर टमाटर व मौसमी सब्जी की खेती की. उपज को देखते हुए खेती का विस्तार करने का निर्णय लिया. इसके बाद 20 एकड़ जमीन में इंट्रीग्रेटेड फार्मिंग पद्धति से 16 किस्म के फलों की खेती शुरू कर दी. मई, 2022 से फसल तैयार होने लगी. शुरुआत स्ट्रॉबेरी से हुई. एक ही जगह पर पांच अलग-अलग किस्म की स्ट्रॉबेरी होने से बाजार की मांग पूरी होने लगी. मृद फार्म के फलों को रांची समेत आसपास के जिलों और बिहार व पश्चिम बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक ट्रांसपोर्ट किया जाने लगा.
सब्जियां उगाने में कामयाब हुए, तो फलों की खेती शुरू की
विशाल ने बताया कि जैविक खेती की जानकारी हासिल करने के क्रम में उनकी पहचान निलेश नंदी से हुई, जिन्होंने जमीन का मुआयना कर इसे विभिन्न किस्म के फलों के लिए अनुकूल बताया. इसके बाद विशाल ने अपने स्टार्टअप से ऑर्गेनिक खेती के नेशनल ट्रेनर सुभाष महतो को भी जोड़ा. सुभाष ने इंटीग्रेटेड फार्मिंग से स्ट्रॉबेरी के पांच किस्म इंटर डाउन, नाबिला, मुरानो, स्वीट सेशन और ब्रिक्यांस के फसल तैयार करने में सहयोग किया. अब विशाल अपनी जमीन पर अमरूद – तैबान पिंक पर्ल, रेड डायमंड, सीडलेस, शरीफा – एनएमके गोल्डन, आम – अलफांसो, आम्रपाली, मलिका, मालदा, थाइलैंड 12 मासी, केसर, सेब (एप्पल) – एचआर प्लांट, अन्ना प्लांट, एप्पल फ्रेश ग्रेफलिंक, प्लम, नाशपाती (पीयर), चिकू, अंजीर, केला – जी9 रोबिस्ता, नारियल – येल्लो ड्वार्फ, ग्रीप ड्वार्फ किवी, एप्रीकॉट (खुबानी), ड्रैगन फ्रूट और केप गुसबेरी (रसभरी) जैसे फलों की फसल तैयार कर रहे हैं. इनके अलावा नींबू की साही शरबती और काली पाती भी उपजा रहे हैं.
Also Read: Jharkhand News: सालखन मुर्मू ने की राष्ट्रपति से पारसनाथ पहाड़ का नाम ‘मरांग बुरु’ करने की मांग
खेती शास्त्र का कर रहे इस्तेमाल
मृद फार्म में इंटीग्रेटेड फार्मिंग के लिए खेती शास्त्र का इस्तेमाल हो रहा है. जहां एक ही जगह पर छह खेती पद्धति – जीवामृत, एंजाइम, ब्रह्मास्त्र, निमास्त्र, अग्निशास्त्र और ताम्र दही को अपनाकर जैविक खेती की जा रही है. विशाल ने बताया कि खेती कि यह पद्धतियां जीरो बजट खेती पद्धति में शामिल है. इसमें केवल पानी की पूर्ति होने पर बेहतर फसल को उपजाया जा सकता है. जमीन में पानी की उपलब्धता के लिए ड्रिप इरिगेशन का इस्तेमाल हो रहा है. इसी से फसलों तक उर्वरक (फर्टिलाइजर) भी उपलब्ध कराये जा रहे हैं. विशाल कहते हैं कि खेती किट से नष्ट न हो इसके लिए आधुनिक तकनीक – सोलर लाइट ट्रिप, इलेक्ट्रिक ट्रिप और कैंप स्टिक का इस्तेमाल किया जा रहा है. मृद फार्म से खूंटी के आस-पास के गांव के करीब 100 घरों के लोगों को रोजगार मिल रहा है.
