पिठोरिया से सुजीत कुमार केशरी की रिपोर्ट
Tribal Language Dialogue: डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, रांची में बुधवार को जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संवाद-2026 का गरिमामय आयोजन किया गया. इस ऐतिहासिक संवाद में झारखंड की नौ प्रमुख जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन, शिक्षा और शोध को लेकर व्यापक चर्चा हुई. कार्यक्रम में कुडुख, मुंडारी, हो, संथाली, नागपुरी, खड़िया, खोरठा, पंचपरगनिया और कुरमाली भाषा से जुड़े शिक्षक-विद्वानों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा भाषा प्रेमियों सहित लगभग 200 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया. कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि पूर्व मंत्री बंधु तिर्की तथा विभिन्न भाषाओं के वरिष्ठ विद्वानों की उपस्थिति में दीप प्रज्वलन और जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के दिवंगत विद्वानों को श्रद्धांजलि अर्पित कर किया गया. कार्यक्रम का संचालन डॉ. शैलजा बाला ने किया.
भाषाई विरासत को बचाने पर दिया गया जोर
मंच पर पूर्व मंत्री बंधु तिर्की के साथ डॉ. शकुंतला मिश्र (नागपुरी), श्रीमती मेरी क्लोडिया सोरेंग (खड़िया), डॉ. मनसिद बड़ायउद (मुंडारी), डॉ. बी.एन. ओहदार (खोरठा), डॉ. हरि उरांव (कुडुख), डॉ. दीनबंधु महतो (पंचपरगनिया एवं संथाली प्रतिनिधि), डॉ. सरस्वती गगराई (हो) तथा डॉ. वृंदावन महतो (कुरमाली) मौजूद रहे. इसके अलावा संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. प्रकाश चंद्र उरांव, डॉ. खालिक अहमद और राजा राम महतो की भी विशेष उपस्थिति रही. कार्यक्रम की शुरुआत मुंडारी विभाग के शोधार्थियों द्वारा प्रस्तुत स्वागत गीत से हुई. इसके बाद डॉ. हेमंत कुमार टोप्पो ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत किया. अपने उद्घाटन संबोधन में बंधु तिर्की ने कहा कि झारखंड की जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं हैं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान, इतिहास और सामाजिक विरासत की आधारशिला हैं. उन्होंने मातृभाषाओं के संरक्षण, संवर्धन, शिक्षा और शोध को समय की आवश्यकता बताते हुए सरकार और समाज दोनों से इस दिशा में गंभीर पहल करने की अपील की.
नौ भाषाओं पर अलग-अलग समूहों में हुई चर्चा
कार्यक्रम के प्रथम तकनीकी सत्र में नौ भाषाओं के शिक्षक-विद्वानों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों को अलग-अलग समूहों में विभाजित किया गया. प्रत्येक समूह ने अपनी भाषा की वर्तमान स्थिति, शिक्षा व्यवस्था, शोध, साहित्य, संरक्षण और भविष्य की चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की. प्रतिभागियों ने इस बात पर चिंता जताई कि आधुनिकता और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के कारण कई स्थानीय भाषाओं का उपयोग लगातार कम हो रहा है. उन्होंने विद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों में मातृभाषाओं के अध्ययन-अध्यापन को और मजबूत बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया.
11 सूत्री साझा मांग-पत्र तैयार कर सौंपा गया
तकनीकी सत्र में प्राप्त सुझावों और प्रस्तावों को समेकित करते हुए एक 11 सूत्री साझा मांग-पत्र तैयार किया गया. यह मांग-पत्र मुख्य अतिथि बंधु तिर्की को सौंपा गया, ताकि इसे राज्य सरकार के समक्ष प्रभावी ढंग से रखा जा सके. प्रतिभागियों ने मांग की कि जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण और विकास के लिए ठोस नीतिगत पहल की जाए. साथ ही भाषा शिक्षा, शोध, प्रकाशन, डिजिटल संसाधनों के विकास और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए पर्याप्त बजट उपलब्ध कराया जाए. उन्होंने भाषाओं के संरक्षण के लिए मजबूत संस्थागत व्यवस्था विकसित करने पर भी बल दिया.
भाषाओं को सांस्कृतिक पहचान का आधार बताया
संवाद में वक्ताओं ने कहा कि झारखंड की जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाएं केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपराओं, इतिहास, लोकज्ञान और सामाजिक पहचान की महत्वपूर्ण धरोहर हैं. यदि इन भाषाओं के संरक्षण के लिए समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियां अपनी भाषाई और सांस्कृतिक जड़ों से दूर होती चली जाएंगी. वक्ताओं ने यह भी कहा कि मातृभाषाओं में शिक्षा को बढ़ावा देने से बच्चों की सीखने की क्षमता मजबूत होती है और स्थानीय संस्कृति के प्रति जुड़ाव भी बढ़ता है.
'जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा बचाओ मोर्चा' का गठन
कार्यक्रम के अंतिम चरण में प्रतिभागियों ने 'जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा बचाओ मोर्चा' के गठन की घोषणा की. इसके साथ ही निर्णय लिया गया कि 10 सितंबर 2026 को पूरे झारखंड में 'जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा यात्रा' निकाली जाएगी. इस यात्रा का उद्देश्य लोगों को मातृभाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के प्रति जागरूक करना तथा सरकार का ध्यान भाषाई मुद्दों की ओर आकर्षित करना होगा.
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राष्ट्रगान के साथ हुआ समापन
कार्यक्रम में बिनाधर सांडिल, जगदीश उरांव, डॉ. बसंत कुमार, विक्की मिंज, चंदन कुमार सहित विभिन्न भाषाओं के अनेक शिक्षक, विद्वान, शोधार्थी और विद्यार्थी मौजूद रहे. आयोजन को सफल बनाने में नौ भाषाओं के शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने सामूहिक रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. अंत में सभी प्रतिभागियों ने जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण और विकास के लिए मिलकर कार्य करने का संकल्प लिया. राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ.
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