रांची की वाल्मीकि अंबेडकर कॉलोनी में जर्जर मकानों के बीच सहमी है जिंदगी, क्या सत्य निकेतन जैसे हादसे का इंतजार कर रहा प्रशासन?

रांची की वाल्मीकि अंबेडकर कॉलोनी, जो कभी गरीबों के लिए सुरक्षित छत का सपना थी, आज जर्जर मकानों, गंदगी और बदहाल सुविधाओं से जूझ रही है। यहां रहने वाले लोगों की जिंदगी खतरे में है।


रांची से अभिषेक आनंद की रिपोर्ट

Ranchi: कभी शहरी गरीबों के लिए सुरक्षित छत के सपने को लेकर बनाई गई झारखंड की राजधानी रांची स्थित चिरौंदी की वाल्मीकि अंबेडकर कॉलोनी आज खुद सुरक्षा के सवालों में घिर गई है. जिस कॉलोनी का मकसद विस्थापित परिवारों और दिहाड़ी मजदूरों को एक बेहतर और सुरक्षित आवास देना था, वहां अब जर्जर मकान, गंदगी, टूटे फर्श, सीलन और बदहाल बुनियादी सुविधाएं लोगों की परेशानी बढ़ा रही हैं. कॉलोनी के कई हिस्सों में हालात ऐसे हैं कि सड़क से लेकर घरों के आसपास तक गंदगी का अंबार नजर आता है. लंबे समय से मरम्मत के इंतजार में इमारतें अपनी उम्र और उपेक्षा दोनों की कहानी कह रही हैं. छतों से पानी टपकने, फर्श टूटने और सेप्टिक टैंक ओवरफ्लो जैसी समस्याओं की शिकायतें भी सामने आती रही हैं.

जर्जर ढांचे में तब्दील हो गए 2004-08 में बने मकान

वाल्मीकि अंबेडकर आवास योजना यानी VAMBAY के तहत इस आवासीय परिसर का निर्माण 2004 से 2008 के बीच कराया गया था. वर्ष 2009 में यहां परिवारों को बसाया गया. करीब 864 से 872 आवासों वाले इस परिसर में आज बड़ी संख्या में परिवार रह रहे हैं. लेकिन, डेढ़ दशक से ज्यादा समय बीतने के बाद सवाल यह है कि क्या इन मकानों की उम्र और उनकी हालत को देखते हुए समय पर मरम्मत और स्ट्रक्चरल ऑडिट हुआ? अगर किसी सरकारी आवासीय परिसर में रहने वाले लोगों को अपने ही मकान की सुरक्षा को लेकर आशंकित रहना पड़े, तो फिर योजना के मूल उद्देश्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है.

5 इंच की दीवार पर खड़ी है तीन मंजिल, उठ रहे सवाल

कॉलोनी में समय के साथ मूल आवासीय ढांचे के ऊपर और आसपास निर्माण भी हुए हैं. स्थानीय लोगों का आरोप है कि कहीं-कहीं बेहद पतली पांच इंच की दीवारों पर बहुमंजिले ढांचे खड़े कर दिए गए हैं. कुछ लोग ऐसे निर्माण को लेकर दिल्ली के सत्य निकेतन में हुए भवन हादसे जैसी आशंका जताते हैं. हालांकि, किसी भवन की वास्तविक संरचनात्मक सुरक्षा का फैसला केवल देखकर नहीं किया जा सकता. इसके लिए तकनीकी जांच, स्ट्रक्चरल ऑडिट और इंजीनियरिंग रिपोर्ट जरूरी है. लेकिन, सवाल अपनी जगह कायम है. अगर पुराने सरकारी आवासीय ढांचे पर अतिरिक्त मंजिलें और भारी निर्माण हो रहे हैं, तो उनकी निगरानी कौन कर रहा है?

गंदगी और जलजमाव ने बढ़ाई परेशानी

कॉलोनी की दूसरी बड़ी समस्या साफ-सफाई और जल निकासी की है. कई हिस्सों में गंदगी जमा रहने की शिकायत है. नालियों की स्थिति और कचरे के कारण लोगों को रोजमर्रा की जिंदगी में परेशानी होती है. स्थानीय निवासियों का कहना है कि इस कॉलोनी में बीते 17 सालों से सफाई नहीं की जा रही है. ऐसी स्थिति में जर्जर इमारतों के साथ अगर जलजमाव और सीलन भी जुड़ जाए, तो भवनों की स्थिति को लेकर चिंता और बढ़ जाती है. गरीबों के लिए बनाए गए घर अगर गंदगी और जर्जरता के बीच रहने को मजबूर कर दें, तो यह सिर्फ नगर निकाय की सफाई व्यवस्था का सवाल नहीं रह जाता, बल्कि शहरी आवास नीति की भी परीक्षा बन जाता है.

मरम्मत या पूरी कॉलोनी का पुनर्विकास?

इस कॉलोनी को लेकर रांची नगर निगम की ओर से नए सिरे से आवासीय परिसर विकसित करने की योजना की बात सामने आती रही है. प्रस्तावित योजना में पुराने ढांचे को हटाकर नए फ्लैट बनाने और मौजूदा निवासियों को दूसरी जगह शिफ्ट करने की बात है. लेकिन यहां एक और बड़ी चुनौती है रोजगार और रोजी-रोटी. कॉलोनी में रहने वाले कई परिवार आसपास के इलाकों में मजदूरी और छोटे-मोटे काम करके अपनी आजीविका चलाते हैं. ऐसे में अगर उन्हें दूर शिफ्ट किया जाता है, तो उनके सामने सिर्फ मकान का नहीं, बल्कि रोजगार और बच्चों की पढ़ाई का भी सवाल खड़ा हो सकता है. यही वजह है कि स्थानीय स्तर पर मरम्मत बनाम पुनर्विकास की बहस लंबे समय से महत्वपूर्ण बनी हुई है.

क्या हादसे के बाद जागेगा सिस्टम?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार क्यों कर रहा है? दिल्ली के सत्य निकेतन में भवन हादसे के बाद देशभर में जर्जर और अनधिकृत निर्माण को लेकर सवाल उठे थे. रांची की इस कॉलोनी में भी स्थानीय लोगों की चिंताओं को उसी नजर से देखने की जरूरत है, बिना किसी हादसे की प्रतीक्षा किए.

  • अगर इमारतें वाकई कमजोर हैं, तो तत्काल तकनीकी जांच होनी चाहिए.
  • अगर अतिरिक्त निर्माण नियमों के खिलाफ हैं, तो कार्रवाई होनी चाहिए.
  • अगर सफाई व्यवस्था खराब है, तो नियमित व्यवस्था सुनिश्चित होनी चाहिए.
  • अगर पूरी कॉलोनी पुनर्विकास के लायक है, तो प्रभावित परिवारों की आजीविका और पुनर्वास को ध्यान में रखकर योजना बननी चाहिए.

सवाल सिर्फ दीवारों का नहीं, लोगों की जिंदगी का है

बाल्मीकि अंबेडकर कॉलोनी की कहानी सिर्फ टूटे मकानों और गंदगी की कहानी नहीं है. यह उन परिवारों की कहानी है, जिन्हें कभी बेहतर जिंदगी देने के लिए यहां बसाया गया था.

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आज परिवार पूछ रहे हैं, 'हमारे घर सुरक्षित हैं या नहीं?'

सरकार और नगर निगम के सामने अब चुनौती साफ है. जर्जर हो चुके इन ढांचों का स्ट्रक्चरल ऑडिट, साफ-सफाई की स्थायी व्यवस्था और भविष्य की स्पष्ट योजना जरूरी है. क्योंकि किसी भी शहर में विकास की असली पहचान सिर्फ चमकती सड़कों और नए कॉम्प्लेक्स से नहीं होती. उस शहर की पहचान इस बात से भी होती है कि उसके सबसे कमजोर नागरिक कितने सुरक्षित घरों में रहते हैं. चिरौंदी की वाल्मीकि अंबेडकर कॉलोनी आज इसी सवाल के जवाब का इंतजार कर रही है, क्या सिस्टम हादसे से पहले जागेगा?

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लेखक के बारे में

By कुमार विश्वत सेन

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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