रांची. झारखंड हाइकोर्ट के रिटायर जस्टिस एसएन पाठक ने कहा कि जंगल पर पहला अधिकार आदिवासियों का है. इस पर न अधिकारियों का अधिकार है और न कंपनियों का. इस कारण जंगल के बारे में कोई भी निर्णय लेते समय आदिवासी हितों पर सोचना चाहिए. विकास का मतलब प्रकृति के साथ खिलवाड़ नहीं हो सकता है. जस्टिस पाठक रविवार को सारंडा का बदलता परिदृश्य विषय पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे. जस्टिस पाठक ने कहा कि खनन से होने वाले नुकसान को नकारा नहीं जा सकता है. सारंडा में होने वाले नुकसान की लड़ाई हमने वकील होते भी लड़ी. 2012 में इससे संबंधित एक जनहित याचिका दायर की गयी थी. इससे संबंधित एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में भी चल रही है. इस पर राज्य सरकार को आदेश जारी किया गया है. राज्य सरकार अब इस आदेश से पीछे नहीं हट सकती है. सरकार को सारंडा को सेंचुरी घोषित कर सुप्रीम कोर्ट को बताना है. कार्यक्रम का आयोजन प्रेस क्लब में युगांतर भारती और नेचर फाउंडेशन ने मिलकर किया.
सारंडा बचाने की लड़ाई लंबी है : सरयू
मौके पर विधायक सरयू राय ने कि सारंडा बचाने की लड़ाई लंबी है. आगे भी जारी रहेगी. भारत सरकार ने खनन के क्षेत्र में जब 2003-04 में नीति बदली, तो स्थिति बदल गयी. झारखंड में खनन के लिए कई निजी कंपनियों ने आवेदन दिये. जिनको खनन का अनुभव नहीं था, उन लोगों ने भी आवेदन किया. गड़बड़ी हुई. पूर्व पीसीसीएफ (वन्य प्राणी) एलआर सिंह ने कहा कि सारंडा पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. ब्रिटिश काल से इसका इतिहास है. कभी यहां गेम सेंचुरी होती था. टाइगर का शिकार करने के लिए 200 रुपये फीस के रूप में देने पड़ते थे. पूर्व पीसीसीएफ एचएस गुप्ता ने कहा कि अगर हम प्रकृति को उनके तरीके से नहीं रहने देंगे, तो प्रकृति हमको अपने हिसाब से रहने को मजबूर कर देगी.
माइंस को माइनस कर नहीं सोच सकते
पूर्व उप निदेशक खान अरुण कुमार ने कहा कि स्टील आज जरूरी है. अगर हम खनन को पूरी तरह प्रतिबंधित कर देंगे, तो विकास अवरुद्ध हो जायेगा. हम पूरी तरह खनन नहीं हो सकते हैं. बीच का रास्ता निकाला जाना चाहिए. झारक्राफ्ट के पूर्व एमडी धीरेंद्र कुमार ने भी अपने विचार रखे.नष्ट कर दिया सारंडा को
पर्यावरणविद आरके सिंह ने कहा कि मैं 1980 से सारंडा पर काम रहा रहूं. देखते-देखते यह नष्ट हो गया. यहां पहले सेंचुरी थी. इसको फिर से बनाने के लिए अदालत की शरण में जाना पड़ा. प्रो डीएस श्रीवास्तव ने कहा कि हम चाहते हैं कि जितनी खनन की जरूरत, उतना ही करें. मौके पर खनन विभाग के उप निदेशक संजीव कुमार, इलेक्ट्रो स्टील के सुरेश सिंह, शिक्षाविद डॉ एमके जमुआर आदि थे.
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