शादीशुदा बेटी को अनुकंपा नियुक्ति से नहीं किया जा सकता वंचित, झारखंड हाईकोर्ट ने दिया आदेश

झारखंड हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति मामले में अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शादीशुदा होने के आधार पर किसी बेटी को अनुकंपा नियुक्ति के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. अदालत ने संबंधित विभाग को आठ सप्ताह के भीतर नियुक्ति देने का निर्देश दिया है.


Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि केवल शादीशुदा होने के आधार पर किसी बेटी को अनुकंपा नियुक्ति के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने धनबाद निवासी किरण ए. पासवान की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोल माइंस प्रोविडेंट फंड ऑर्गनाइजेशन (CMPFO) की ओर से उनकी अनुकंपा नियुक्ति का दावा खारिज करने वाले आदेश को रद्द कर दिया. अदालत ने संबंधित विभाग को याचिकाकर्ता को निर्धारित नियमों के तहत आठ सप्ताह के भीतर अनुकंपा नियुक्ति देने का निर्देश दिया है.

पिता की सेवा के दौरान हुई थी मृत्यु

याचिकाकर्ता किरण पासवान के पिता अर्जुन प्रसाद CMPFO के धनबाद क्षेत्र में सहायक के पद पर कार्यरत थे. 25 नवंबर 2013 को सेवा के दौरान उनकी मृत्यु हो गयी. उनके परिवार में पत्नी जयंती देवी, बेटी किरण और दो बेटे सत्य प्रकाश प्रसाद तथा रवि कुमार थे. पिता की मृत्यु के बाद किरण की ओर से अनुकंपा नियुक्ति के लिए दावा किया गया था. विभाग ने उनकी नियुक्ति का दावा इस आधार पर खारिज कर दिया कि वह पिता की मृत्यु के समय शादीशुदा थीं, उनके पति की आमदनी थी और उनके दोनों भाई भी सेवा में थे. बाद में हाईकोर्ट के आदेश के बाद मामले पर दोबारा विचार किया गया, लेकिन 12 फरवरी 2024 को फिर नियुक्ति का दावा खारिज कर दिया गया. इसके बाद किरण ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की.

कोर्ट ने कहा, पति की कम आय से निर्भरता खत्म नहीं

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता की मां ने 31 दिसंबर 2013 के हलफनामे में यह नहीं कहा था कि उनकी बेटी के पति के पास पर्याप्त रोजगार या आमदनी थी. इसके उलट, दो जनवरी 2014 को अनुकंपा नियुक्ति के लिए दिए गये आवेदन में मां ने स्पष्ट किया था कि शादी के बाद भी उनकी बेटी अपने पिता पर पूरी तरह निर्भर थी और पिता ही जीवित रहते उसके तथा उसके बच्चों की देखभाल करते थे.

जांच में दोनों भाई नौकरी करते पाए गए

अदालत ने यह भी पाया कि जांच में दोनों भाइयों के नौकरी में होने की जानकारी सामने आयी, लेकिन वे अपनी-अपनी जिंदगी और परिवार के साथ अलग रह रहे थे. दोनों भाइयों ने मां की देखभाल और आर्थिक जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया था. वहीं किरण स्वयं कहीं नौकरी नहीं कर रही थीं. वह अपनी मां के साथ रह रही थीं और दोनों की आर्थिक स्थिति CMPFO से मिलने वाली सीमित पेंशन तथा पति की कम आय पर निर्भर थी.

शादीशुदा बेटी के लिए भी नियमों में प्रावधान

कोर्ट ने केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के 30 मई 2013 के निर्देश का उल्लेख किया. इसके तहत शादीशुदा बेटी को अनुकंपा नियुक्ति के लिए दो शर्तें पूरी करनी होती हैं. पहली, वह सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के समय उस पर पूरी तरह निर्भर रही हो और दूसरी, उसे परिवार के अन्य आश्रित सदस्यों का भरण-पोषण करना हो.

पिता पर निर्भर थी बेटी, मां भी हो गई थी वृद्ध

हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों से स्पष्ट है कि किरण अपने पिता पर निर्भर थीं और उनकी मां भी वृद्ध तथा स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों के कारण स्वयं रोजगार करने की स्थिति में नहीं थीं. इसलिए केवल इस आधार पर कि किरण विवाहित थीं और उनके पति की कुछ आय थी, यह नहीं माना जा सकता कि वह अपने पिता पर निर्भर नहीं थीं. अदालत ने साफ कहा कि वैवाहिक स्थिति अपने आप में अनुकंपा नियुक्ति के दावे को खत्म नहीं कर सकती, जब वास्तविक निर्भरता साबित हो.

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पेंशन को नौकरी का विकल्प नहीं माना जा सकता

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अनुकंपा नियुक्ति की योजना के कल्याणकारी उद्देश्य को तकनीकी और प्रक्रियात्मक कठोरता के कारण कमजोर नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि परिवार को मिलने वाली पेंशन या सेवानिवृत्ति संबंधी लाभ अनुकंपा नियुक्ति का विकल्प नहीं हैं. इसके बाद हाईकोर्ट ने CMPFO के 12 फरवरी 2024 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें किरण की नियुक्ति का दावा खारिज किया गया था. अदालत ने संबंधित अधिकारी को आदेश की प्रति प्राप्त होने के आठ सप्ताह के भीतर निर्धारित नियमों के अनुसार उन्हें अनुकंपा नियुक्ति देने का निर्देश दिया. फैसला 12 अगस्त 2026 को सुनाया गया.

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By Rana pratap

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