इनपुट- तन्वी झा
रांची : झारखंड की धरती अपनी प्राकृतिक सुंदरता और खनिज संपदा के साथ-साथ अपनी समृद्ध लोक संस्कृति और पावन परंपराओं के लिए जानी जाती है. इस संस्कृति का पावन पर्व 'करम' इस वर्ष 22 सितंबर (मंगलवार) को पूरे राज्य में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा. भाद्रपद (भादो) महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाने वाला यह प्रकृति पूजा, लहलहाती फसलों की कामना, भाई-बहन के अटूट स्नेह और सामाजिक एकजुटता का उदाहरण प्रस्तुत करता है.
एक हफ्ता पहले से ही शुरू हो जाती है तैयारियां
करम पर्व की तैयारियां करीब एक सप्ताह पहले से ही शुरू हो जाती हैं. पर्व से कुछ दिन पूर्व लड़कियां और महिलाएं नदी तट से पवित्र बालू (रेत) लाकर टोकरियों में रखती हैं. इसमें सात प्रकार के अनाज जैसे जौ, मक्का, गेहूं, चावल, चना, कुल्थी और मसूर बोए जाते हैं, जिसे 'जावा' कहा जाता है. अंकुरित होता हुआ यह जावा जीवन की नई शुरुआत, जनन क्षमता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. वहीं, पूजा के दिन करम वृक्ष की तीन डालियों को काटकर लाया जाता है और गांव के 'अखड़ा' या घर के आंगन में स्थापित किया जाता है. ये तीनों शाखाएं त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश), तीनों लोकों और काल चक्र का प्रतीक मानी जाती हैं. इसके साथ ही, धान की फसलों को कीटों और अन्य नुकसानदायक तत्वों से बचाने के लिए खेतों में 'भेलवा' पेड़ की टहनियां गाड़ी जाती हैं.
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करम और धरम की पौराणिक कथा: क्यों पूजी जाती है करम डाल?
लोक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में 'करम' और 'धरम' नाम के दो भाई रहते थे. धरम जहां केवल अपने काम (कर्तव्य) को महत्व देता था, वहीं करम का मानना था कि जीवन में खुशहाली के लिए कर्म के साथ-साथ प्रकृति और परंपराओं का सम्मान भी जरूरी है. एक बार विवाद में आकर करम ने गुस्से में करम वृक्ष की डाल का अनादर कर दिया, जिससे उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा और सुख-समृद्धि खत्म हो गई. जब उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ, तो उन्होंने क्षमा मांगकर विधि-विधान से करम देवता की पूजा की, जिसके बाद उनका जीवन फिर से खुशियों से भर गया. इसी विश्वास के आधार पर आज भी करम डाल को पवित्र मानकर उसकी पूजा की जाती है.
'सहिया' परंपरा और पर्यावरण संरक्षण का संदेश
करम पर्व केवल पूजा-पाठ तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इस दिन आदिवासी समाज में 'सहिया' (सच्ची दोस्ती) जोड़ने की एक अद्भुत परंपरा है, जो पीढ़ियों तक दो परिवारों व समुदायों को अटूट रिश्ते में बांधकर रखती है. ऐसी मान्यता है कि करम पूजा के समापन के बाद ही समाज में शादियों और अन्य शुभ कार्यों की शुरुआत होती है. पूजा के बाद रातभर मांदर और ढोल की थाप पर 'करम नृत्य' का आयोजन होता है, जिनके लोकगीतों के माध्यम से प्रकृति प्रेम, खेती और सामाजिक सीख अगली पीढ़ी तक पहुंचाई जाती है. कुल मिलाकर यह पर्व बिना किसी भेदभाव के प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने और पर्यावरण संरक्षण का सबसे बड़ा संदेश देता है.
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