रांची. बांग्लादेश में रहने वाले झारखंडी मूल के आदिवासी समुदाय के लिए इस बार करम पर्व खास रहा. ढाका विश्वविद्यालय के साथ राजशाही विश्वविद्यालय में भी करम उत्सव का आयोजन किया गया. उरांव और मुंडा समुदाय के लोगों ने उत्सव में हिस्सा लिया और करमगीतों व ढोल की थाप पर करमनृत्य किया.
बांग्लादेश में झारखंडी मूल के आदिवासी समुदाय के लोग लंबे समय से अपने पारंपरिक पर्व-त्योहारों को लेकर चुनौतियों का सामना करने की बात कहते रहे हैं. खासकर अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के सत्ता से हटने के बाद वहां अल्पसंख्यक समुदायों की स्थिति को लेकर विभिन्न स्तरों पर चिंता सामने आती रही है. इसी दौर में आदिवासी समुदाय के लोगों द्वारा करम और सरहुल जैसे पर्व सीमित स्तर पर मनाये जाने की बात कही गयी थी.
ढाका और राजशाही विश्वविद्यालय में हुआ आयोजन
राजशाही जिला के बोटटोली थाना निवासी किशोर कुमार मुंडा ने बताया कि आदिवासी छात्र परिषद की ओर से राजशाही विश्वविद्यालय में करम उत्सव का आयोजन किया गया. उनके अनुसार, उत्सव के दौरान किसी तरह की बंदिश नहीं थी और लोगों ने खुलकर करम पर्व मनाया. करमगीतों और ढोल की थाप पर लोगों ने पारंपरिक करमनृत्य किया.
संस्कृति और परंपरा को बचाये रखने की कोशिश
किशोर कुमार मुंडा के अनुसार, बांग्लादेश में आदिवासी समुदाय अपने स्तर पर करम पर्व का आयोजन करता है. उन्होंने कहा कि आयोजन के लिए सरकार या किसी अन्य संस्था की ओर से सहयोग नहीं मिलता है. उनका यह भी कहना है कि बांग्लादेश में आदिवासी समुदाय को अब तक आदिवासी का दर्जा नहीं मिला है.
ढाका और राजशाही विश्वविद्यालय में करम उत्सव का आयोजन बांग्लादेश में रह रहे झारखंडी मूल के आदिवासी समुदाय के लिए अपनी संस्कृति और परंपरा को जीवित रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. करम पर्व के माध्यम से समुदाय के लोग अपनी पारंपरिक पहचान और सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं.
