नई दिल्ली/रांची: लोकसभा ने बुधवार को खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 विपक्ष के हंगामे के बीच पारित कर दिया. विधेयक के तहत राज्यों को खनिज अधिकारों पर अतिरिक्त कर, उपकर या अन्य शुल्क लगाने से रोका जायेगा. साथ ही खनिज-युक्त भूमि के विनियमन से जुड़े कुछ अधिकार केंद्र सरकार के नियंत्रण में होंगे. केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री जी किशन रेड्डी ने विपक्ष के विरोध के बीच विधेयक पेश किया. अभी इसे राज्यसभा में पेश किया जाना बाकी है.
आरएसपी के एनके प्रेमचंद्रन ने किया विरोध
आरएसपी के एनके प्रेमचंद्रन ने विधेयक का विरोध करते हुए इसे संविधान और संघीय ढांचे के खिलाफ बताया. हालांकि, विपक्ष के हंगामे के बीच सदन ने बिना चर्चा के विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया. विधेयक में प्रावधान है कि राज्य सरकार खनिज अधिकारों पर किसी भी नाम से कर, उपकर या अन्य शुल्क नहीं लगा सकेगी. ये प्रावधान खनिज-युक्त भूमि पर भी लागू होंगे. केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों और प्रतिबंधों के अनुसार ही खनिज की मात्रा, मूल्य, रॉयल्टी या अन्य आधार पर ऐसी भूमि पर कोई कर या शुल्क लगाया जा सकेगा.
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विधेयक में किया गया विशेष प्रावधान
विधेयक के अनुसार, 2026 के संशोधन अधिनियम के लागू होने से पहले लगाया गया ऐसा कोई कर, उपकर या शुल्क, जो राज्य सरकार के पास जमा नहीं हुआ है या जिसकी वसूली नहीं की गयी है, उसे अवैध माना जायेगा. हालांकि, लागू होने से पहले खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर लगाया गया कोई कर, उपकर या अन्य शुल्क यदि राज्य सरकार के पास जमा हो चुका है या वसूल लिया गया है, तो उसे वापस नहीं किया जाएगा. वहीं, जिन लोगों ने अब तक ऐसा सेस या कर जमा नहीं किया है, उन्हें आगे भी उसे जमा नहीं करना होगा.
सरकार ने बिल को आर्थिक विकास से जोड़ा
केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी ने कहा कि संशोधन का उद्देश्य खनिज क्षेत्र में वित्तीय व्यवस्था को स्थिर, स्पष्ट और अनुमान योग्य बनाना है. उनके मुताबिक, इससे राष्ट्रीय आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा और आत्मनिर्भर भारत तथा 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को गति मिलेगी. उन्होंने कहा कि अलग-अलग क्षेत्रों में खनिजों पर असमान कर व्यवस्था सार्वजनिक हित को प्रभावित करती है. अधिक टैक्स और शुल्क से स्थानीय आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होने, बाजार के विकास में कमी आने और परिवहन लागत बढ़ने की स्थिति बनती है. इससे घरेलू स्तर पर खनिजों की आपूर्ति महंगी हो सकती है और पर्याप्त स्थानीय संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद खनिजों के आयात का जोखिम बढ़ सकता है. इसका असर आम नागरिक की जीवन-यापन लागत पर भी पड़ सकता है.
झारखंड पर पड़ेगा सीधा असर
खनिज संपदा के मामले में झारखंड देश के प्रमुख राज्यों में शामिल है. ऐसे में इस विधेयक का असर झारखंड पर दूसरे राज्यों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है. झारखंड ने 2024 में झारखंड मिनरल बियरिंग लैंड सेस कानून बनाया था. इसके तहत खनिज-युक्त भूमि, जिसमें कोयला-युक्त भूमि भी शामिल है, पर खनिज के प्रेषण के आधार पर उपकर लगाने की व्यवस्था की गयी है. इससे पिछले वित्तीय वर्ष में राज्य सरकार को केवल झारखंड मिनरल बियरिंग लैंड सेस से करीब आठ हजार करोड़ रुपये का राजस्व मिला था. इस वर्ष सरकार ने जेएमबीएल सेस से 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक राजस्व मिलने का अनुमान लगाया है.
झारखंड लंबे समय से केंद्र सरकार से 1.36 लाख करोड़ रुपये की बकाया राशि की मांग करता रहा है, जो अब बढ़कर करीब 1.41 लाख करोड़ रुपये हो गयी है. इसमें एक लाख करोड़ रुपये से अधिक की मांग भूमि इस्तेमाल के मुआवजे के रूप में है. इसमें 41,142 करोड़ रुपये बकाया और करीब 60 हजार करोड़ रुपये ब्याज शामिल है. नए विधेयक से झारखंड के इस राजस्व और केंद्र से बकाया राशि की मांग पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है. हालांकि, विधेयक से झारखंड की रॉयल्टी पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
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