रांची से राणा प्रताप की रिपोर्ट
Jharkhand High Court, रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने पलामू के एक सहायक शिक्षक द्वारा दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए शिक्षा विभाग के अधिकारियों की कार्यशैली पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है. अदालत के आदेश का अनुपालन न करने पर कड़ा रुख अपनाते हुए माननीय न्यायालय ने पलामू के जिला शिक्षा अधीक्षक (डीएसई) को अगली सुनवाई के दौरान व्यक्तिगत रूप से (सशरीर) कोर्ट में हाजिर होने का निर्देश दिया है. अदालत ने सख्त लहजे में पूछा कि आदेश का पालन न करने पर क्यों न आपके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू की जाए. इस मामले की अगली सुनवाई के लिए अदालत ने 5 अगस्त की तिथि निर्धारित की है.
आदेश के बावजूद नहीं दिया गया बकाया अवधि का लाभ
सुनवाई के दौरान प्रार्थी (याचिकाकर्ता) की ओर से पक्ष रखते हुए अधिवक्ता प्रेम पुजारी राय ने अदालत को बताया कि हाईकोर्ट रूल-393 के तहत नोटिस जारी होने के बाद मई 2026 में प्रार्थी को नौकरी पर वापस तो रख लिया गया (पुनर्बहाल कर दिया गया), लेकिन जिस अवधि में उन्हें गलत तरीके से नौकरी से हटाया गया था, उस पूरी अवधि के वित्तीय व अन्य सेवा लाभ नहीं दिए गए. अधिवक्ता ने कोर्ट को ध्यान दिलाया कि एकल पीठ (सिंगल बेंच) ने प्रार्थी को सेवा में बहाल करने के साथ-साथ सभी बकाया लाभों का भुगतान करने का स्पष्ट निर्देश दिया था. इससे पहले हुई सुनवाई में अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह प्रार्थी को नौकरी से हटाए जाने के पहले के सभी लाभ देना सुनिश्चित करें. उस दौरान सरकार की ओर से 8 सप्ताह का समय मांगे जाने के आग्रह को भी अदालत ने खारिज कर दिया था. अधिवक्ता प्रेम पुजारी राय ने यह भी बताया कि एकल पीठ के इस आदेश के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा दायर की गई अपील भी पहले ही खारिज हो चुकी है.
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5 साल की सेवा के बाद डिप्रेशन में चले गए थे शिक्षक नंदू राम
यह मामला सहायक शिक्षक नंदू राम से जुड़ा हुआ है, जिन्होंने इस संबंध में अवमानना याचिका दायर की है. उनकी नियुक्ति 31 दिसंबर 1999 को सहायक शिक्षक के पद पर हुई थी और वे पलामू जिले के मध्य विद्यालय विश्रामपुर में पदस्थापित थे. लगभग पांच वर्षों की सेवा के बाद, वे डिप्रेशन के शिकार हो गए और इलाज के लिए मेडिकल लीव (अवकाश) पर चले गए. इस दौरान उन्होंने विभाग को अपनी छुट्टियां बढ़ाने के लिए आवेदन भी भेजा था. अदालती दस्तावेजों के अनुसार, नंदू राम वर्ष 2004 से लगातार अवकाश पर थे. लंबे इलाज के बाद जब डॉक्टरों ने उन्हें पूरी तरह फिट घोषित किया, तब वे 19 जनवरी 2012 को स्कूल में अपनी ड्यूटी ज्वाइन करने पहुंचे. लेकिन विभाग ने उन्हें योगदान देने से रोक दिया और सेवा से बर्खास्त कर दिया. इसके बाद उन्होंने इस बर्खास्तगी के खिलाफ झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां अदालत ने उनकी बर्खास्तगी को पूरी तरह निरस्त करते हुए सेवा में बहाल करने का आदेश सुनाया था.
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