रांची से राणा प्रताप की रिपोर्ट
Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने वन एवं पर्यावरण विभाग से जुड़े एक रिटायर कर्मचारी के मामले में राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए उसकी दोनों लेटर पेटेंट अपील (एलपीए) खारिज कर दी हैं. मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि राज्य सरकार एक ऐसे कर्मचारी को, जो वर्ष 2013 में रिटायर हो चुका है, अनावश्यक रूप से प्रताड़ित नहीं कर सकती. अदालत ने राज्य सरकार को कर्मचारी के सभी बकाया भुगतान चार सप्ताह के भीतर करने का निर्देश भी दिया.
119 दिन की देरी माफ, फिर भी अपील नहीं टिक सकी
राज्य सरकार ने एकल पीठ के 25 जून 2024 के फैसले को चुनौती देते हुए दो अलग-अलग अपीलें दाखिल की थीं. इन अपीलों में 119 दिनों की देरी हुई थी, जिसे अदालत ने पर्याप्त कारण मानते हुए माफ कर दिया. हालांकि, मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार की अपीलों में कोई ठोस आधार नहीं है और उन्हें खारिज कर दिया.
राज्य ने फैसले पर जताई थी आपत्ति
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि शेख इज्जतुल्लाह का मामला बसरत हुसैन के मामले से अलग है. सरकार का तर्क था कि चूंकि कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं, इसलिए उनकी पुनर्बहाली या विभागीय कार्रवाई दोबारा शुरू करने का प्रश्न ही नहीं उठता. इसी आधार पर एकल पीठ के आदेश में हस्तक्षेप की मांग की गई.
कोर्ट ने कहा, सेवानिवृत्ति भेदभाव का आधार नहीं
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि केवल इस वजह से कि कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुका है, उसे दूसरे समान मामले के कर्मचारी की तुलना में कमतर स्थिति में नहीं रखा जा सकता. अदालत ने पाया कि बसरत हुसैन को सभी सेवानिवृत्ति लाभ दिए गए, जबकि शेख इज्जतुल्लाह के साथ बिना उचित कारण भेदभाव किया गया.
पूर्व प्रभाव से बर्खास्तगी को बताया पूरी तरह अवैध
खंडपीठ ने यह भी कहा कि राज्य सरकार की दलीलों में विरोधाभास है. एक ओर सरकार कहती है कि पुनर्बहाली संभव नहीं थी, वहीं दूसरी ओर रिकॉर्ड से पता चलता है कि कर्मचारी को पूर्व प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव इफेक्ट) से दोबारा बर्खास्त करने का आदेश जारी किया गया. अदालत ने इसे प्रथम दृष्टया अवैध बताते हुए कहा कि ऐसा आदेश कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकता.
पीएफ रोकने पर भी कोर्ट ने जताई नाराजगी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि पहले समन्वय पीठ ने कर्मचारी का भविष्य निधि (पीएफ) भुगतान करने का आदेश दिया था. आदेश के बावजूद भुगतान नहीं किया गया, जिसके कारण अदालत को प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) की व्यक्तिगत उपस्थिति सुनिश्चित करनी पड़ी और उनका वेतन रोकने तक का आदेश देना पड़ा. बाद में सरकार ने बताया कि पीएफ का भुगतान कर दिया गया है, जिसके बाद अदालत ने वेतन रोकने का आदेश वापस ले लिया.
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रिटायर कर्मचारी प्रताड़ना पर कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सुनवाई के अंत में राज्य सरकार ने झारखंड पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) के तहत आगे कार्रवाई की अनुमति मांगी. इस पर अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मांग पूरी तरह गलत सोच को दर्शाती है. कोर्ट ने कहा कि राज्य वर्ष 2013 में सेवानिवृत्त कर्मचारी को शांति से जीवन जीने देने के बजाय लगातार प्रताड़ित करना चाहता है. अदालत ने ऐसी अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया. साथ ही कहा कि राज्य के आचरण पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता था, लेकिन सरकारी वकील के आग्रह पर फिलहाल ऐसा नहीं किया गया. अंततः अदालत ने सरकार के इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया कि कर्मचारी के सभी बकाया का भुगतान चार सप्ताह के भीतर कर दिया जाएगा.
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