Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने रांची के नगड़ी गांव की करीब 2.98 एकड़ अधिग्रहित जमीन वापस करने की मांग वाली 66 साल पुराने विवाद से जुड़ी याचिका खारिज कर दी है. न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने कहा कि एक बार भूमि का वैध अधिग्रहण हो जाने, मुआवजा दिए जाने और जमीन राज्य में निहित (वेस्ट) हो जाने के बाद उसे पूर्व मालिकों को वापस करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता. यह फैसला W.P.(C) संख्या 4590/2014 में सुनाया गया, जिसमें नागड़ी गांव के कृष्ण कच्छप समेत अन्य याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि उनके पूर्वजों की भूमि बिरसा कृषि महाविद्यालय (अब बिरसा कृषि विश्वविद्यालय) के लिए अधिग्रहित की गई थी, लेकिन उसका उपयोग नहीं हुआ और इसलिए जमीन उन्हें लौटाई जानी चाहिए.
1957-58 में हुआ था अधिग्रहण
रिकॉर्ड के अनुसार, 1957-58 में नगड़ी गांव की लगभग 202 एकड़ जमीन बिरसा कृषि महाविद्यालय की स्थापना के लिए भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत अधिग्रहित की गई थी. याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि 1968 और 1970 में अधिकारियों ने कुछ जमीन छोड़ने की सिफारिश की थी और उनके पूर्वजों को मुआवजा भी नहीं मिला था. उन्होंने यह भी कहा कि वे अब तक जमीन पर काबिज हैं और उनके नाम से लगान रसीदें भी जारी होती रही हैं.
राज्य सरकार ने दावों को बताया निराधार
राज्य सरकार ने अदालत में कहा कि याचिका 2014 में दायर हुई, जबकि अधिग्रहण की प्रक्रिया 1957-58 की थी. यानी लगभग 66 वर्ष की देरी से यह मामला उठाया गया. सरकार ने रिकॉर्ड पेश कर बताया कि अधिग्रहण की पूरी प्रक्रिया कानून के अनुसार पूरी हुई थी, पुरस्कार (Award) पारित हुआ था और मूल भू-स्वामियों को मुआवजा भी दिया गया था. साथ ही अंचल अधिकारी की जांच रिपोर्ट में भी भूमि के अधिग्रहित होने की पुष्टि की गई थी.
रिंग रोड और एनयूएसआरएल के काम आ रही जमीन
सुनवाई के दौरान बिरसा कृषि विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय विधि अध्ययन एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय (NUSRL) ने बताया कि विवादित भूमि का एक हिस्सा रांची की रिंग रोड के निर्माण में उपयोग किया जा चुका है, जबकि दूसरा हिस्सा एनयूएसआरएल को हस्तांतरित कर दिया गया है. बिरसा कृषि विश्वविद्यालय ने इस उपयोग के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) भी जारी किया था.
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला दिया. अदालत ने कहा कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 16 के तहत कब्जा और अधिग्रहण पूरा होने के बाद जमीन राज्य में पूरी तरह निहित हो जाती है. यदि मूल सार्वजनिक उद्देश्य पूरा नहीं भी हो, तो ऐसी भूमि का उपयोग किसी अन्य सार्वजनिक उद्देश्य के लिए किया जा सकता है. उसे पूर्व मालिकों को वापस करने का प्रावधान नहीं है.
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याचिकाकर्ता नहीं साबित कर सके उत्तराधिकार
अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि वे मूल अवार्डधारकों के वैध उत्तराधिकारी हैं. उन्होंने अपनी वंशावली या आवश्यक दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं किए. इन तथ्यों और कानूनी स्थिति को देखते हुए अदालत ने कहा कि मामले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता और याचिका खारिज कर दी.
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