रांची से सतीश सिंह की रिपोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने मॉरीशस स्थित SSR मेडिकल कॉलेज के चेयरमैन प्रताप नारायण सिंह और उनकी सचिव रंजीत कौर के खिलाफ अरगोड़ा थाना में दर्ज धोखाधड़ी, अमानत में खयानत और आपराधिक साजिश के मामले को रद्द कर दिया है. अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि एफआईआर में लगाये गये सभी आरोपों को सही भी मान लिया जाये, तब भी आईपीसी की धारा 406, 420 और 120बी के तहत कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है.
जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की अदालत ने याचिका पर सुनवाई के बाद यह आदेश पारित किया. अदालत ने माना कि इस मामले में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग होगा.
बेटे के मेडिकल दाखिले को लेकर दर्ज करायी थी शिकायत
शिकायतकर्ता ने अरगोड़ा थाना में मामला दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि उनके बेटे कैरव किर्तने ने सत्र 2019-2024 के लिए एसएसआर मेडिकल कॉलेज, मॉरीशस में एमबीबीएस पाठ्यक्रम में दाखिला लिया था. कॉलेज के कर्मचारियों और शिक्षकों पर छात्र को कक्षाओं तथा परीक्षाओं के दौरान मानसिक रूप से परेशान करने और अनुचित तरीके अपनाने का आरोप लगाया गया था.
इसके अलावा, परीक्षा में बैठने की अनुमति देने के एवज में 3000 अमेरिकी डॉलर अतिरिक्त वसूलने और इसके बाद भी प्री-यूनिवर्सिटी परीक्षा में छात्र को फेल कर देने का आरोप था. शिकायतकर्ता ने लगभग 49.63 लाख रुपये की भारी आर्थिक क्षति होने की बात कही थी.
याचिकाकर्ताओं ने कहा- छात्र ने अपनी मर्जी से छोड़ी पढ़ाई
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि दिल्ली स्थित कॉलेज का कार्यालय महज एक संपर्क कार्यालय था. छात्र ने अपनी मर्जी से मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया था और प्रबंधन की ओर से उसे किसी प्रकार का कोई प्रलोभन नहीं दिया गया था. कॉलेज की फीस सीधे मॉरीशस स्थित ट्रस्ट के बैंक खाते में जमा की गयी थी.
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि छात्र ने लगभग साढ़े चार साल तक अध्ययन करने के बाद अपनी इच्छा से कोर्स छोड़ा था. कॉलेज के नियमों के अनुसार कोर्स के लिए 80 प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य थी, जबकि छात्र की उपस्थिति मात्र 46 प्रतिशत ही दर्ज की गयी थी.
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फीस भुगतान को अमानत में खयानत नहीं माना
हाईकोर्ट ने धारा 406 (अमानत में खयानत) के संदर्भ में कहा कि इस अपराध के लिए किसी संपत्ति या धनराशि का आरोपी को विशेष उद्देश्य से सुपुर्द किया जाना और उसका बेईमानी से दुरुपयोग होना आवश्यक है. मेडिकल कॉलेज की फीस का भुगतान एक सामान्य संविदात्मक और वित्तीय लेन-देन है, जिसे आईपीसी की धारा 405 के दायरे में 'अमानत' नहीं माना जा सकता. इसलिए इस धारा के तहत केस नहीं बनता है.
शुरुआत से धोखे की मंशा का आरोप नहीं
धारा 420 (धोखाधड़ी) पर अदालत ने टिप्पणी की कि यह अपराध तभी सिद्ध होता है जब लेन-देन की शुरुआत से ही आरोपी की मंशा धोखा देने की रही हो. इस मामले में याचिकाकर्ताओं का छात्र या उसके परिवार से सीधे संपर्क में होने तथा आरंभ से ही ठगने की नीयत का कोई पुख्ता आरोप नहीं है. जब छात्र खुद साढ़े चार साल तक संस्थान में शिक्षा ग्रहण करता रहा, तो शुरुआत से धोखाधड़ी का आरोप टिक नहीं सकता.
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