बिपिन सिंह की रिपोर्ट
केरल का कोट्टायम जिला देश में ‘लैंड ऑफ लेटेक्स’ के नाम से जाना जाता है. यहां भारतीय रबर बोर्ड का मुख्यालय और रबर रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया स्थित है. रबर की खेती, अनुसंधान और इसके व्यावसायिक इस्तेमाल को बढ़ावा देने में संस्थान की महत्वपूर्ण भूमिका है. कोट्टायम के रबर बागानों में पेड़ों से निकलने वाले दूध यानी लेटेक्स से प्राकृतिक रबर तैयार होता है.
झारखंड के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के अब सामान्य जनजीवन की ओर लौटने के साथ वहां खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की संभावनाएं भी बढ़ी हैं. इन्हीं संभावनाओं की तलाश में झारखंड के पत्रकारों का एक दल इन दिनों केरल के पांच दिवसीय दौरे पर है. दौरे के दौरान भारतीय रबर बोर्ड और रबर रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के विशेषज्ञों से झारखंड में रबर की व्यावसायिक खेती की संभावनाओं पर चर्चा हुई.
लाखों हेक्टेयर जमीन पर हो सकती है रबर की खेती
कोट्टायम स्थित भारतीय रबर बोर्ड मुख्यालय में झारखंड से पहुंचे पत्रकारों के दल के समक्ष दिए गए प्रजेंटेशन में झारखंड को रबर की खेती के लिए संभावनाओं वाला राज्य बताया गया. रबर रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के सभागार में विशेषज्ञों ने कहा कि झारखंड की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए कई जिलों में बड़े पैमाने पर रबर की व्यावसायिक खेती विकसित की जा सकती है.
रबर बोर्ड के अधिकारियों ने पूर्वोत्तर राज्यों, खासकर त्रिपुरा का उदाहरण देते हुए बताया कि विश्व बैंक की मदद से वर्ष 1990 के बाद वहां व्यापक स्तर पर रबर प्लांटेशन को बढ़ावा दिया गया. इसी मॉडल को झारखंड के कुछ चयनित क्षेत्रों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अपनाया जा सकता है.
पायलट प्रोजेक्ट से होगी शुरुआत
विशेषज्ञों के अनुसार, शुरुआत में करीब 20 एकड़ जमीन पर पायलट प्रोजेक्ट के रूप में रबर की खेती विकसित की जा सकती है. इसका उद्देश्य केवल रबर उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि स्थानीय आदिवासियों और युवाओं को रोजगार तथा स्थायी आय का जरिया उपलब्ध कराकर उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत करना भी है.
रबर के पेड़ों से मिलने वाले लेटेक्स का इस्तेमाल टायर, कन्वेयर बेल्ट, जूते, ऑटोमोबाइल पार्ट्स समेत रोजमर्रा के उपयोग और औद्योगिक क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले हजारों उत्पादों के निर्माण में किया जाता है.
कृषि विश्वविद्यालय के साथ साझेदारी से आगे बढ़ेगी योजना
झारखंड में रबर से जुड़े डीलरों, व्यापारियों और रीक्लेम्ड रबर निर्माताओं के लिए रबर बोर्ड का पंजीकरण और डीलर लाइसेंस लेना अनिवार्य है. राज्य में कई कारोबारी पहले से रबर बोर्ड के नियमों के तहत पंजीकृत हैं.
नई व्यावसायिक खेती को विकसित करने के लिए बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, झारखंड के साथ भी सहयोग की योजना बनाई जा रही है. विशेषज्ञों के अनुसार, राज्य कृषि विश्वविद्यालय के साथ समझौता ज्ञापन (एमओयू) के जरिए रबर की खेती, पौधों के चयन, तकनीकी प्रशिक्षण और स्थानीय परिस्थितियों के अध्ययन को आगे बढ़ाया जा सकता है.
2014 में भी झारखंड में रबर खेती की उठी थी बात
भारत में रबर का उत्पादन मुख्य रूप से केरल और पूर्वोत्तर राज्यों तक सीमित रहा है. हालांकि, झारखंड के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में रबर की खेती की संभावनाओं पर करीब डेढ़ दशक पहले भी विचार शुरू हुआ था.
वर्ष 2014 के आसपास झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में रबर की खेती शुरू करने की संभावनाओं को लेकर प्रस्ताव तैयार किया गया था. इन क्षेत्रों की जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों को रबर की खेती के लिए संभावित माना गया था. हालांकि, भारतीय रबर बोर्ड की ओर से केंद्र सरकार को भेजे गए विशेष प्रस्ताव पर उस समय बात आगे नहीं बढ़ सकी.
रबर प्लांटेशन बनेगा कार्बन सिंक
रबर की खेती सिर्फ किसानों की आय बढ़ाने का माध्यम नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी मददगार हो सकती है. एक हेक्टेयर रबर प्लांटेशन से बड़े पैमाने पर कार्बन का अवशोषण संभव है. इससे झारखंड में नए हरित क्षेत्र विकसित करने की संभावनाएं भी बनेंगी.
रबर के हरे पेड़ प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के जरिए वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) सोखते हैं और उसे तने, शाखाओं और जड़ों में बायोमास के रूप में जमा करते हैं। इस लिहाज से रबर प्लांटेशन को कार्बन सिंक के रूप में भी देखा जा रहा है.
प्राकृतिक रबर की मांग लगातार बढ़ रही
सिंथेटिक रबर पेट्रोलियम आधारित रसायनों से तैयार होता है, जबकि प्राकृतिक रबर पौधों से प्राप्त होता है. वैश्विक स्तर पर पर्यावरण के प्रति बढ़ती चिंता के बीच प्राकृतिक और बायोडिग्रेडेबल रबर की मांग बढ़ रही है.
विशेषज्ञों के अनुसार, प्राकृतिक रबर की लचक और दबाव व गर्मी सहने की क्षमता के कारण इसका इस्तेमाल विमान के टायर और कई औद्योगिक वाहनों के टायरों में महत्वपूर्ण है. इसके अलावा ऑटोमोबाइल और विभिन्न औद्योगिक उत्पादों में भी प्राकृतिक रबर की बड़ी मांग है.
मांग के मुकाबले आपूर्ति में 35 फीसदी से अधिक का अंतर
एम. वसंतगेसन, कार्यकारी निदेशक, भारतीय रबर बोर्ड, कोट्टायम, केरल ने कहा कि भारत में रबर उद्योग में मांग की तुलना में आपूर्ति का अंतर 35 प्रतिशत से अधिक है। अधिक से अधिक किसानों को रबर की खेती से जोड़कर इस अंतर को काफी हद तक कम किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि देश में बढ़ते रबर आयात को कम करने के लिए रबर बोर्ड झारखंड जैसे गैर-पारंपरिक राज्यों में भी संभावित जमीन की पहचान कर रहा है. राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर ऐसे भौगोलिक क्षेत्रों की पहचान की जा रही है, जहां मिट्टी और पर्यावरण की परिस्थितियां प्रयोगात्मक तौर पर रबर के पौधों के विकास के लिए अनुकूल हो सकती हैं.
पांच से सात साल में शुरू होगा उत्पादन
डॉ. देबब्रत राय, डायरेक्टर, रबर रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (आरआरआईआई) ने बताया कि भारत के पूर्वी राज्य त्रिपुरा के मॉडल की तर्ज पर झारखंड के छोटे और मंझोले किसानों के साथ रबर की खेती को विकसित किया जा सकता है.
उन्होंने बताया कि रबर के पौधे सामान्य तौर पर पांच से सात साल में उत्पादन देना शुरू कर देते हैं. लॉन्ग टर्म एग्रीकल्चर प्लान के तहत झारखंड में इसकी खेती को लेकर नीतियों को आगे बढ़ाया जा सकता है. पौधों के पूरी तरह तैयार होने के बाद एक बार विकसित रबर प्लांटेशन से करीब 30 से 35 साल तक उत्पादन लिया जा सकता है.
रबर रिसर्च इंस्टीट्यूट की नींव 1956 में
रबर रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के मुख्यालय की स्थापना की दिशा में महत्वपूर्ण कदम चार फरवरी 1956 को उठाया गया था. इसी दिन भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संस्थान के मुख्यालय की आधारशिला रखी थी.
देश में रबर का क्षेत्रफल बढ़ा
- 1950-51 : 74,915 हेक्टेयर
- 2000-01 : 5,62,670 हेक्टेयर
- 2024-25 : 9,39,300 हेक्टेयर
