रांची से राणा प्रताप की रिपोर्ट
Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त शिक्षक श्याम देव प्रसाद सिंह की लंबित पेंशन के मामले में राज्य सरकार को बड़ा निर्देश दिया है. अदालत ने कहा कि जब विभागीय कार्रवाई पूरी हो चुकी है और 10 प्रतिशत पेंशन काटने की सजा पहले ही तय की जा चुकी है, तब अंतिम पेंशन निर्धारण (फाइनल पेंशन फिक्सेशन) रोकने का कोई औचित्य नहीं है. कोर्ट ने सरकार को छह सप्ताह के भीतर सभी आवश्यक दस्तावेज महालेखाकार (एजी) को भेजने और इसके बाद छह सप्ताह में अंतिम पेंशन भुगतान आदेश (पीपीओ) जारी करने का निर्देश दिया है.
विभागीय कार्रवाई के बाद भी नहीं हुई अंतिम पेंशन तय
मामले की सुनवाई जस्टिस दीपक रौशन की अदालत में हुई. याचिकाकर्ता श्याम देव प्रसाद सिंह कोडरमा जिले में सहायक शिक्षक थे और 31 दिसंबर 2016 को सेवानिवृत्त हुए थे. सेवा के दौरान उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू हुई थी. बाद में सरकार ने आदेश जारी कर उनकी पेंशन में 10 प्रतिशत की कटौती 10 वर्षों के लिए करने का निर्णय लिया. यह आदेश अंतिम रूप से प्रभावी हो गया, लेकिन इसके बावजूद उनका अंतिम पेंशन भुगतान आदेश जारी नहीं किया गया.
केवल 90 प्रतिशत प्रोविजनल पेंशन मिल रही थी
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि विभाग उनकी सेवा पुस्तिका और पेंशन संबंधी दस्तावेज महालेखाकार कार्यालय को नहीं भेज रहा है. इसके कारण उन्हें वर्षों से केवल 90 प्रतिशत प्रोविजनल पेंशन मिल रही है. अंतिम पेंशन निर्धारण नहीं होने से हर महीने ट्रेजरी जाकर पेंशन निकालनी पड़ रही है, जबकि अंतिम पीपीओ जारी होने पर राशि सीधे बैंक खाते में जमा हो सकती है.
सरकार ने लंबित आपराधिक मामले का दिया हवाला
राज्य सरकार ने अदालत में कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ चंदवारा थाना कांड संख्या 38/2017 लंबित है. यह मामला छात्रवृत्ति राशि में कथित गबन और वित्तीय अनियमितता से जुड़ा है. सरकार का तर्क था कि आपराधिक मामला लंबित रहने के कारण अंतिम पेंशन निर्धारित नहीं की जा सकती.
हाईकोर्ट ने सरकार की दलील को नहीं माना
हाईकोर्ट ने सरकार की दलील स्वीकार नहीं की. अदालत ने कहा कि जिस कथित वित्तीय अनियमितता के आधार पर विभागीय कार्रवाई हुई, उसी आधार पर पहले ही 10 प्रतिशत पेंशन 10 वर्षों के लिए काटने की सजा दी जा चुकी है. ऐसे में उसी कारण का हवाला देकर अंतिम पेंशन निर्धारण रोकना झारखंड पेंशन नियमावली, 2000 के नियम 43(बी) की मंशा के विपरीत है. कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि विभागीय कार्रवाई पूरी हो चुकी है और दंड निर्धारित हो चुका है, तो केवल लंबित आपराधिक मुकदमे के आधार पर सेवा पुस्तिका और पेंशन पत्रावली महालेखाकार को भेजने से इनकार नहीं किया जा सकता.
छह-छह सप्ताह की समय सीमा तय
अदालत ने राज्य सरकार के संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि आदेश की प्रति प्राप्त होने के छह सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता की सेवा पुस्तिका, पेंशन पत्रावली और स्वीकृति आदेश महालेखाकार कार्यालय भेजे जाएं. इसके बाद महालेखाकार कार्यालय अगले छह सप्ताह में अंतिम पेंशन भुगतान आदेश जारी करे. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को 1 जनवरी 2017 से 31 दिसंबर 2026 तक 90 प्रतिशत पेंशन तथा 1 जनवरी 2027 से 100 प्रतिशत पेंशन का लाभ दिया जाए.
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मेडिकल भत्ते पर अलग से करना होगा दावा
याचिकाकर्ता ने सेवानिवृत्ति के बाद प्रति माह 1000 रुपये मेडिकल भत्ता देने की भी मांग की थी. इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में यह स्पष्ट नहीं है कि यह दावा किस नियम, अधिसूचना या सरकारी प्रावधान के तहत किया गया है. इसलिए अदालत ने सीधे भुगतान का आदेश नहीं दिया. हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को संबंधित विभाग के समक्ष नया आवेदन देने की छूट दी और सरकार को निर्देश दिया कि यदि नियमों के तहत मेडिकल भत्ता देय है तो लंबित आपराधिक मामले का आधार बनाकर उसे रोका नहीं जाए. आवेदन पर छह सप्ताह के भीतर कारणयुक्त आदेश पारित कर पात्रता होने पर राशि का भुगतान सुनिश्चित किया जाए.
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