महिला फुटबॉलर दिव्यानी लिंडा के भाई का रिम्स में होगा इलाज, परिवार मिल संजय सेठ ने दिया भरोसा

Ranchi News: केंद्रीय मंत्री संजय सेठ ने महिला फुटबॉलर दिव्यानी लिंडा के परिवार से मुलाकात कर भाई के रिम्स में इलाज का भरोसा दिया. उन्होंने दिव्यानी को विकसित भारत की ब्रांड एंबेसडर बताया. दिव्यानी ने संघर्षों के बीच अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल में पहचान बनाई और अब वर्ल्ड कप खेलने का सपना देख रही हैं. इससे जुड़ी खबर नीचे पढ़ें.

Ranchi News: अंडर-17 महिला फुटबॉल खिलाड़ी दिव्यानी लिंडा के भाई का अब रिम्स में इलाज होगा. गुरुवार को केंद्रीय मंत्री संजय सेठ ने उसके परिसार से मुलाकात की. केंद्रीय मंत्री संजय सेठ ने दिव्यानी लिंडा को भरोसा दिया है कि उसके भाई का इलाज रिम्स में कराने की व्यवस्था की जाएगी. इस दौरान उन्होंने दिव्यानी को “विकसित भारत की ब्रांड एंबेसडर” बताते हुए कहा कि इतनी कठिन परिस्थितियों में भी देश का नाम रोशन करना बड़ी उपलब्धि है.

छोटी सी झोपड़ी में रखी हैं 50 से ज्यादा ट्रॉफियां

संजय सेठ ने कहा कि दिव्यानी का जीवन संघर्षों से भरा रहा है. उन्होंने कहा, “उसकी छोटी सी झोपड़ी में दुनिया भर से जीती हुई 50 से भी ज्यादा ट्रॉफियां और मेडल रखे हुए हैं. यह सिर्फ एक खिलाड़ी की उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व की बात है.” उन्होंने बताया कि दिव्यानी की मां दिहाड़ी मजदूर हैं, जबकि उसका भाई कमर के नीचे से लकवे का शिकार है. परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है. मंत्री ने कहा कि दिव्यानी के पिता का चार साल पहले निधन हो गया था और इसके बावजूद उसने अपने सपनों को टूटने नहीं दिया.

भाई के इलाज की होगी व्यवस्था

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि सरकार दिव्यानी के भाई के इलाज की व्यवस्था एम्स में करवाने का प्रयास कर रही है. साथ ही उन्होंने भरोसा दिलाया कि परिवार की हरसंभव मदद की जाएगी ताकि दिव्यानी बिना किसी चिंता के अपने खेल पर पूरा ध्यान केंद्रित कर सके. उन्होंने कहा, “हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है कि दिव्यानी और उसके परिवार का ध्यान रखें. देश की बेटियां आगे बढ़ेंगी तभी भारत खेलों में नई ऊंचाइयों तक पहुंचेगा.”

दुर्गा पूजा से पहले मिलेगा नया घर

संजय सेठ ने घोषणा की कि दिव्यानी के परिवार के लिए दुर्गा पूजा से पहले नया घर बनवाया जाएगा. इसके अलावा गांव में खेल मैदान भी तैयार किया जाएगा ताकि दिव्यानी जैसी अन्य प्रतिभाशाली लड़कियों को बेहतर अभ्यास की सुविधा मिल सके. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमेशा खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने की बात करते हैं. खिलाड़ियों को सिर्फ मेडल जीतने पर ध्यान देना चाहिए और बाकी जिम्मेदारी समाज व सरकार को निभानी चाहिए.

दिव्यानी बोली- सुबह 4 बजे उठकर करती थी अभ्यास

दिव्यानी लिंडा ने भी अपने संघर्ष और उपलब्धियों को साझा किया. उन्होंने बताया कि बचपन से ही उन्हें फुटबॉल खेलने का बहुत शौक था. टीवी पर बड़े खिलाड़ियों को देखकर उनके अंदर कुछ कर गुजरने की प्रेरणा मिली. उन्होंने कहा, “मेरी मां शुरू में मुझे खेलने से रोकती थीं. उन्हें डर था कि मुझे चोट लग सकती है. लेकिन मैं हर सुबह 4 बजे उठकर अभ्यास के लिए जाती थी.” दिव्यानी ने बताया कि उन्होंने 2024 में आयोजित अंडर-16 एसएएफएफ टूर्नामेंट में हिस्सा लिया, जहां भारतीय टीम उपविजेता रही. इसके बाद भूटान में हुए अंडर-17 टूर्नामेंट में भारतीय टीम चैंपियन बनी.

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वर्ल्ड कप खेलने का सपना

दिव्यानी ने कहा कि भारतीय टीम ने किर्गिस्तान में एएफसी टूर्नामेंट खेला और अगले चरण के लिए क्वालीफाई किया. इसके बाद चीन में आयोजित क्वालीफाइंग राउंड में टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए क्वार्टर फाइनल तक का सफर तय किया.

उन्होंने कहा, “मैं एक ऑलराउंडर खिलाड़ी हूं और परिस्थिति के अनुसार अपनी भूमिका बदल लेती हूं. अभी मैं अंडर-19 सीनियर टीम में जगह बनाने के लिए प्रशिक्षण ले रही हूं. मेरा लक्ष्य देश का नाम रोशन करना और वर्ल्ड कप की तैयारी करना है.” दिव्यानी की यह कहानी संघर्ष, मेहनत और सपनों को साकार करने की मिसाल बन चुकी है. सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने जिस तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है, वह झारखंड ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए गर्व की बात है.

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Published by: KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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