Ranchi News : दिव्यांगता नहीं पहचान, प्रतिभा है असली परिचय

दिव्यांगता कमजोरी नहीं, एक अलग तरह की ताकत है. बस समाज को दृष्टि बदलनी होगी.

आज विश्व दिव्यांगता दिवस. बाधाओं को अवसर में बदलने वाले युवाओं की कहानियां बताती हैं कि दिव्यांगता कमी नहीं, क्षमता की नयी परिभाषा

तकनीक, खेल, संगीत और उद्यमिता में दिखा रहे कमाल, चुनौतियों के बावजूद आगे बढ़ने का जज्बा सभी के लिए सीख

यूडीआइडी कार्ड, शिक्षण संस्थानों में प्रवेश और सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दों पर भी खुलकर रख रहे अपनी बात

रांची. दिव्यांगता कमजोरी नहीं, एक अलग तरह की ताकत है. बस समाज को दृष्टि बदलनी होगी. रांची के दिव्यांगजन यह बात केवल कह नहीं रहे, बल्कि अपने काम से साबित कर रहे हैं. विश्व दिव्यांगता दिवस के ठीक एक दिन पहले जब शहर के चार प्रतिभाशाली दिव्यांगों से बात हुई, तो उनकी कहानियों ने यह एहसास दिलाया कि चुनौती वहां नहीं होती, जहां कमी होती है, बल्कि वहां होती है जहां स्वीकार्यता, अवसर और समर्थन नहीं मिलता. संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 1992 से इस दिन को मनाना शुरू किया, ताकि दुनिया दिव्यांगजनों की समस्याओं, अधिकारों और प्रतिभाओं पर ध्यान दे सके.

रांची के चार चेहरे बताते हैं कि प्रतिभा पैर या आंखों से नहीं, दृष्टिकोण से बाधित होती है. दिव्यांगजन किसी दया के पात्र नहीं, बल्कि अवसर और समानता के हकदार हैं. रांची के कई दिव्यांगजन अपने साहस, कला और मेहनत से समाज को दिशा दे रहे हैं. आइए मिलते हैं उनसे…

सीमा कुमारी : तकनीक से दृष्टिबाधित बच्चों को नयी राह दिखाती युवा प्रशिक्षक

हिनू चौक की सीमा कुमारी बचपन से अल्पदृष्टि हैं. दोनों आंखों से स्पष्ट नहीं देख पातीं, लेकिन उनकी दृष्टि सीमित नहीं विस्तृत है. वे दृष्टिबाधित बच्चों को आधुनिक तकनीक, स्क्रीन रीडर और गैजेट्स का नि:शुल्क प्रशिक्षण देती हैं. ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों में वर्कशॉप आयोजित करती हैं. सीमा मास्टर्स डिग्री धारक हैं और अपने स्कूल-कॉलेज की ऐसी पहली छात्रा रहीं, जिन्होंने आम बच्चों के साथ पढ़ाई की और अच्छे अंक हासिल किए.

सीमा का संदेश : दिव्यांगता मन की होती है. यदि हम खुद को कमतर मान लें, तो हर इंसान दिव्यांग कहलायेगा, क्योंकि कोई भी संपूर्ण नहीं. वे चाहती हैं कि समाज दृष्टिबाधितों को सहानुभूति से नहीं, समानता से देखे.

रंजीत कुमार : अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर, रांची में तैयार की डिफ बॉयज और गर्ल्स टीम

खेलगांव के रंजीत कुमार ऑल इंडिया क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ द डेफ के इंटरनेशनल खिलाड़ी हैं. वे केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व ही नहीं करते, बल्कि रांची में मुक-बधिर बच्चों को क्रिकेट की ट्रेनिंग देते हैं. उन्होंने न सिर्फ बॉयज बल्कि गर्ल्स टीम भी तैयार की है, जो झारखंड में प्रेरणा का बड़ा उदाहरण है. रंजीत दिव्यांग बच्चों और उनके परिजनों की साइन लैंग्वेज से काउंसेलिंग भी करते हैं.

रंजीत का संदेश : हर दिव्यांगजन में चमक छिपी होती है. जरूरत बस उसे पहचानने और मौका देने की है. उनका संदेश समाज के लिए साफ है भ्रांतियां तोड़ें, प्रतिभा को जगह दें.

नुराइशा तब्बसूम : बिना देखे क्राफ्ट वर्क की दुनिया में जादू रचने वाली कलाकार

मेन रोड की नुराइशा बचपन से दृष्टिहीन हैं, लेकिन उनकी कला आंखों से नहीं दिल से देखती है. वे थ्रेड बैंगल, होम डेकोर और अनेक क्राफ्ट आइटम पूरी तरह स्पर्श और संवेदना के आधार पर बनाती हैं. वे एंकरिंग और कविता-पाठ भी करती हैं. सबसे खास बात वे अपने हस्तनिर्मित उत्पादों की मार्केटिंग यूट्यूब और सोशल मीडिया पर खुद करती हैं, जिसमें उनका परिवार उनका साथ देता है.

नुराइशा का संदेश : हर इंसान में एक छुपी प्रतिभा होती है. जब वह बाहर आती है, तो वही इंसान की ताकत बन जाती है. इसलिए आम इंसान की प्रतिभा सामने आने पर वह खास हो जाते हैं.

शुभोदीप तरफदार : दृष्टिहीन होकर भी शास्त्रीय संगीत और शिक्षा दोनों में टॉपर

थड़पखना के शुभोदिप जन्म से दृष्टिहीन हैं, पर उनकी उपलब्धियां असाधारण है. वे शास्त्रीय संगीत कलाकार हैं और श्रुति नंदन, कोलकाता में पंडित अजय चक्रवर्ती से प्रशिक्षण ले रहे हैं. दसवीं में झारखंड दिव्यांग कोटे से 90.2%, राज्य टॉपर 12वीं में सामान्य छात्रों के साथ 93.4%, स्कूल के सेकेंड टॉपर रहे हैं. वे स्क्रीन रीडर के जरिए टाइपिंग और ऑनलाइन काम सहजता से कर लेते हैं. लेकिन, वे झारखंड की व्यवस्था से निराश हैं.

शुभोदीप का संदेश : हमारे राज्य में दिव्यांगजनों के लिए सुविधाएं कम हैं, जो हैं, उन्हें हासिल करना बेहद मुश्किल है.

झारखंड में दिव्यांगजनों की तीन प्रमुख चुनौतियां

1. यूडीआइडी कार्ड बनवाने में भारी परेशानीपूरे देश में दिव्यांगता का मूल प्रमाण यूनीक डिसएबिलिटी आइडी है. लेकिन, झारखंड के कई गांवों में लोग इसके बारे में जानते ही नहीं. सरकारी अस्पतालों में भी कर्मचारी कई बार यूडीआइडी को यूआइडी आधार कार्ड समझ बैठते हैं और प्रज्ञा केंद्र भेज देते हैं. इसका परिणाम होता है कि दिव्यांगजन महीनों चक्कर काटकर थक जाते हैं और अंत में कार्ड बनवाने की कोशिश छोड़ देते हैं.

2. उच्च शिक्षा में प्रवेश और शुल्क की समस्याकई कॉलेज दिव्यांग छात्रों को प्रवेश देने में आनाकानी करते हैं. दिव्यांगता आधारित रियायत और आरक्षण की नीतियों की जानकारी छात्रों और संस्थानों दोनों को नहीं. दिल्ली जैसे शहरों में अवसर बेहतर हैं, पर आर्थिक वजह से बहुत से दिव्यांग वहां नहीं जा पाते. यही कारण है कि कई प्रतिभाशाली छात्र 10वीं-12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं.

3. शिक्षण संस्थानों की भारी कमीराज्य में दृष्टिबाधित छात्रों के लिए केवल कुछ ही माध्यमिक विद्यालय है. आठवीं के बाद पढ़ाई के लिए संस्थान लगभग न के बराबर है. मूक-बधिर छात्रों के लिए आठवीं के बाद एक भी विशेष विद्यालय नहीं, जिससे उनकी पढ़ाई बीच में रुक जाती है. यह स्थिति राज्य के हजारों बच्चों के भविष्य को प्रभावित कर रही है.

दिव्यांगजनों की चार जरूरी मांगें

1. यूडीआइडी कार्ड पर बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाया जाये. गांव-गांव कैंप लगें, अस्पताल कर्मचारियों को प्रशिक्षण मिले ताकि दिव्यांगजन आसानी से अपना मूल प्रमाण पत्र बनवा सकें.

2. प्रवेश में भेदभाव पर सख्त कार्रवाई, सभी कॉलेजों और विद्यालयों को स्पष्ट निर्देश मिले कि दिव्यांगजन को प्रवेश से मना नहीं किया जा सकता है.

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, वर्ष 2016 का पालन अनिवार्य हो.

3. शुल्क रियायत की नीति स्पष्ट और अनिवार्य हो. सभी शिक्षण संस्थान दिव्यांग छात्रों को रियायत, स्कॉलरशिप, शुल्क माफी जैसी योजनाएं लागू करें और इसकी सूचना सार्वजनिक करें.

4. विशेष शिक्षण संस्थानों की संख्या बढ़ाई जाये. दृष्टिबाधित और मूक-बधिर छात्रों के लिए उच्च माध्यमिक, व्यावसायिक, डिजिटल तकनीक आधारित

स्कूल और प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया जाये.

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