मनोज सिंह
Jharkhand: झारखंड में लगभग 29 फीसदी वन भूमि है. यह राष्ट्रीय औसत से अधिक है. यहां साल में करीब 1300-1400 मिमी के आसपास बारिश भी हो जाती है. जंगल का डेनसिटी कम होने और समुचित जल प्रबंधन नहीं होने के कारण यहां की जमीन बंजर होती जा रही है. मरुस्थल में बदलता जा रहा है. जमीन के मरुस्थलीकरण के मामले में झारखंड टॉप राज्यों में है. झारखंड का करीब 69 फीसदी भूमि बंजर होने की ओर है. यह रिपोर्ट इसरो की है. इसरो की रिपोर्ट के अनुसार झारखंड के आठ जिलों की स्थिति सबसे सबसे खराब हैं. इसमें सबसे खराब स्थिति गिरिडीह जिले की है. गुमला, रांची, दुमका, जामताड़ा भी इसी श्रेणी में आता है.
50 फीसदी मरुस्थल होने का कारण बारिश का पानी
रिपोर्ट कहता है कि झारखंड की भूमि का मरुस्थल होने का मुख्य कारण बारिश का पानी है. झारखंड का लैंड स्कैप ऐसा है कि पानी नहीं रुक पाता है. बारिश का पानी भूमि की ऊपरी परत को बहाकर ले जाता है. मिट्टी का ऊपरी परत बह जाने के कारण मिट्टी बंजर होता जा रहा है. उपजाऊ क्षमता घटती जा रही है. उपज बढ़ाने के लिए ज्यादा उर्वरक का उपयोग होने लगा है. इससे मिट्टी और खराब हो रहा है. यह मिट्टी को और ख़राब कर रहा है.
खनन कर रहा है भूमि खराब
रिपोर्ट में झारखंड में खराब खनन गतिविधियों के कारण भी भूमि मरुस्थल हो रहा है. झारखंड में कोल इंडिया की तीन बड़ी-बड़ी कोयला कंपनी (सीसीएल, बीसीसीएल और इसीएल ) हैं. इसके अतिरिक्त आयरन ओर और अबरख की कई कंपनी भी हैं. इससे खेती योग्य भूमि को नुकसान हो रहा है. राज्य में कोयला कंपनी 40 हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि पर खनन का काम कर रही है. इससे आस-पास की भूमि खेती योग्य नहीं रह पा रही है.
शहरीकरण भी है बड़ा कारण
इसरो ने अपने रिपोर्ट में झारखंड में शहरीकारण को भी मरुस्थल बनने का एक बड़ा कारण बताया है. कहा गया है कि राज्य गठन के बाद झारखंड में तेजी से शहरीकरण हो रहा है. बड़ी आबादी शहरों की ओर शिफ्ट हुई है. इस कारण झारखंड की भूमि को नुकसान हुआ है. छोटे कस्बे शहरों में बदल गये हैं. इसका असर भी झारखंड की भूमि पर भी हुआ है.
महत्वपूर्ण आंकड़े
- झारखंड में 68.77% भूमि की गुणवत्ता खराब हो चुकी है.
- राज्य की 79.71 लाख हेक्टेयर भूमि किसी न किसी रूप में क्षरण की चपेट में है.
- 54.80 लाख हेक्टेयर भूमि की गुणवत्ता बिगड़ चुकी है.
- इसरो की रिपोर्ट में झारखंड में भूमि क्षरण की गंभीर स्थिति पर चेतावनी दी गयी है.
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
झारखंड के लिए जो सबसे अच्छी बात है, वही अभिशाप बनती जा रही है. यहां भूमि का कटाव तेजी से हो रहा है. ऐसा बारिश की पानी का उचित प्रबंधन नहीं होने के कारण हो रहा है. 1300 से 1400 मिमी बारिश के बाद भी एक फसली खेती हो रही है. जंगल की गुणवत्ता खराब हो रही है. इसके लिए जरूरी है कि हम झारखंड की धरती पर ही ज्यादा से ज्यादा पानी रोकने की कोशिश करें. इसके लिए भूमि संरक्षण की विधि को दुरुस्त करने की जरूरत है. जंगलो को पुनर्जीवित करने की जरूरत है. इसके लिए वैसे तो झारखंड में कई विभाग मिलकर काम कर रहे हैं लेकिन आपसी समन्वय की कमी है. पानी झारखंड की ही धरती पर रुके इसके लिए व्यापक योजना की जरूरत है. तभी झारखंड की भूमि को बंजर होने से रोक सकते हैं.
सबसे अधिक भूमि क्षरण वाले जिले (% में)
- देवघर – 99.8%
- दुमका – 93.7%
- गिरिडीह – 92.7%
- गोड्डा – 90.0%
- धनबाद – 87.4%
- गुमला – 85.5%
- बोकारो – 85.5%
- पाकुड़ – 78.7%
- लातेहार – 71.1%
- कोडरमा – 68.2%
अपेक्षाकृत कम प्रभावित जिले
- हजारीबाग – 62.1%
- गोड्डा – 59.9%
- पूर्वी सिंहभूम – 57.7%
- चतरा – 47.0%
- साहिबगंज – 32.8%
- पलामू – 26.9%
- गढ़वा – 22.8%
चिंताजनक आंकड़े
एक हेक्टेयर खेत से बहकर सालाना करीब 50 करोड़ लीटर पानी नष्ट हो जाता है.
झारखंड में 2011-13 की तुलना में भूमि क्षरण की स्थिति और गंभीर हुई है.
राज्य के 14 जिले राष्ट्रीय औसत से अधिक भूमि क्षरण से प्रभावित हैं.
समाधान के सुझाव
- जल व मृदा संरक्षण कार्यों पर बड़े पैमाने पर निवेश.
- कृषि विभाग द्वारा 500 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना.
- वनीकरण को बढ़ावा.
- खेतों में मेढ़बंदी, चेकडैम, तालाब और जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण.
- ढलानदार क्षेत्रों में वैज्ञानिक खेती और मिट्टी संरक्षण उपाय.
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