कोयला कंपनियों के CSR पर नया नियम, 80% पैसा खनन प्रभावित क्षेत्रों में खर्च करना होगा

कोयला मंत्रालय ने CSR खर्च के लिए एक नया ढांचा तैयार किया है. अब खर्च के साथ-साथ वास्तविक परिणाम और प्रभाव पर भी जोर दिया जाएगा. खनन प्रभावित क्षेत्रों में 80% राशि खर्च करने का नया नियम लागू होगा.

रांची. कोयला कंपनियों के कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) खर्च का तरीका अब बदल जायेगा. कोयला मंत्रालय ने CSR के लिए नया एकीकृत ढांचा तैयार कराया है. इसमें केवल राशि खर्च करने के बजाय उसके वास्तविक परिणाम और प्रभाव को भी महत्व दिया गया है. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कॉरपोरेट अफेयर्स (IICA) द्वारा तैयार इस ढांचे में एक ही तरह की परियोजना पर कुल वार्षिक CSR बजट का 40 फीसदी से अधिक खर्च नहीं किया जा सकेगा.

नये प्रावधान के तहत CSR बजट का 80 फीसदी प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में खर्च करना होगा. इसमें खनन प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा, स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका और सामुदायिक विकास से जुड़े कार्य शामिल हैं. शेष 20 फीसदी राशि कंपनी के संचालन वाले राज्य या राज्यों में अन्य विकास कार्यों पर खर्च की जा सकती है.

खर्च में संतुलन बनाने का प्रयास

नये ढांचे में किसी एक ही प्रकार की परियोजना पर कुल वार्षिक CSR बजट का लगभग 40 फीसदी से अधिक खर्च नहीं करने का प्रावधान किया गया है. स्वास्थ्य, पोषण और सामुदायिक कल्याण से जुड़ी योजनाओं को प्राथमिकता दी गयी है. इनमें स्वास्थ्य देखभाल, मोबाइल मेडिकल यूनिट, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रम शामिल हैं.

शिक्षा के क्षेत्र में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को मजबूत करने, स्कूल अवसंरचना, डिजिटल कक्षाओं और छात्रवृत्ति पर CSR राशि खर्च की जा सकेगी. स्थानीय युवाओं, महिलाओं और स्व-सहायता समूहों के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा कृषि और गैर-कृषि आधारित आजीविका को बढ़ावा देने की योजनाएं भी प्राथमिकता में रहेंगी.

तीन साल के औसत शुद्ध लाभ का 2% CSR पर खर्च

कंपनियों को पिछले तीन वित्तीय वर्षों के औसत शुद्ध लाभ का कम से कम दो फीसदी CSR गतिविधियों पर खर्च करना अनिवार्य है. इसके अलावा पिछले वर्ष के कोयला उत्पादन के आधार पर दो रुपये प्रति टन की राशि, जो भी अधिक हो, CSR में खर्च करनी होगी.

किसी भी वित्तीय वर्ष में कुल CSR खर्च का अधिकतम पांच फीसदी ही प्रशासनिक मद में खर्च किया जा सकेगा.

खर्च के साथ परिणाम की भी होगी समीक्षा

नया ढांचा केवल CSR राशि खर्च होने का ब्योरा दर्ज करने तक सीमित नहीं रहेगा. इसमें योजनाओं के वास्तविक परिणाम और प्रभाव पर भी जोर दिया गया है. इसके लिए 12 चरणों वाला वार्षिक CSR चक्र तैयार किया गया है, जो जरूरत के आकलन से शुरू होकर अंतिम प्रभाव मूल्यांकन तक चलेगा.

निष्पक्ष मूल्यांकन के लिए दो नये स्व-मूल्यांकन इंडेक्स भी पेश किये गये हैं. इससे CSR परियोजनाओं के परिणाम और उनके प्रभाव का आकलन करने पर जोर रहेगा.

खनन प्रभावित क्षेत्रों में 80% राशि

कोयला क्षेत्र की CSR नीति के अनुसार बजट का 80 फीसदी प्राथमिक क्षेत्र में खर्च करना होगा. यह राशि खदानों, प्रोजेक्ट साइट, एरिया मुख्यालय या कंपनी मुख्यालय से 25 किलोमीटर के दायरे में आने वाले प्रभावित क्षेत्रों और गांवों में खर्च की जानी है.

प्राथमिक लाभार्थियों में भूमि गंवाने वाले लोग, परियोजना प्रभावित व्यक्ति और स्थानीय जरूरतमंद समुदाय शामिल होंगे. शेष 20 फीसदी राशि कंपनी के संचालन वाले राज्य या राज्यों में अन्य विकास कार्यों पर खर्च की जा सकेगी.

2024-25 में शिक्षा पर CCL ने खर्च किये थे 37 करोड़

सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (CCL) ने 2024-25 में CSR मद में शिक्षा और उससे संबंधित मामलों पर करीब 37 करोड़ रुपये खर्च किये थे. यह कुल करीब 81 करोड़ रुपये के CSR खर्च का लगभग 45 फीसदी था. इससे पिछले वित्तीय वर्ष 2025-26 में कंपनी ने शिक्षा मद में करीब 31 करोड़ रुपये खर्च किये थे, जो करीब 85 करोड़ रुपये के कुल CSR खर्च का लगभग 37 फीसदी था.

इन क्षेत्रों में भी खर्च की जा सकेगी CSR राशि

  • संपर्क सड़कें, सामुदायिक भवन, सौर ऊर्जा स्ट्रीट लाइट और ग्रामीण बुनियादी ढांचा.
  • पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के तहत वृक्षारोपण, जल संरक्षण, अपशिष्ट प्रबंधन और हरित पहल.
  • अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, दिव्यांगजन, वृद्धों और महिला नेतृत्व वाले परिवारों के लिए सहायता कार्यक्रम.
  • ग्रामीण क्षेत्रों में खेल सुविधाओं का निर्माण और स्थानीय खिलाड़ियों को प्रशिक्षण.
  • स्थानीय संस्कृति और शिल्प का संरक्षण तथा सार्वजनिक पुस्तकालयों को समर्थन.
  • प्राकृतिक या अन्य आपदाओं के दौरान आपातकालीन राहत और पुनर्वास.

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लेखक के बारे में

By Manoj Kumar Singh

मनोज सिंह प्रभात खबर में बतौर मुख्य संवाददाता कार्यरत है. पत्रकारिता में उनका 26 साल का अनुभव है. दैनिक हिन्दुस्तान में करीब आठ साल काम करने के बाद वह प्रभात खबर से जुड़े हैं. कृषि, पशुपालन, सहकारिता, वन, जलवायु परिवर्तन, आजीविका, मनोरोग, कोयला संबंधी खबरों में वर्षों काम करने का अनुभव है.

आइआइटी कानपुर से जस्ट ट्रांजिशन विषय पर फेलोशिप प्राप्त करने वाले देश के पहले संवाददाता है. उनको दो बार एग्रई जर्निलिज्म अवार्ड मिल चुका है. झारखंड सरकार के वन विभाग से तिलका मांझी अवार्ड मिला है. कई मचों पर वह प्रभात खबर का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में हिस्सा ले चुके हैं.


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