धरती की चिंता कीजिए
आज वर्ल्ड अर्थ डे है. हम जिस पृथ्वी पर रहते हैं, उसे रहने लायक बनाये रखना जरूरी है.
अभिषेक रॉय
. आज वर्ल्ड अर्थ डे है. कहा जाता है कि चांद पर जाने का मतलब भी यही है कि हम जिस पृथ्वी पर रहते हैं, उसे रहने लायक बनाये रखें. इस दिवस का उद्देश्य भी यही है कि लोग पृथ्वी के महत्व को समझें. इस वर्ष पृथ्वी दिवस का थीम ””””ग्रह बनाम प्लास्टिक””””. थीम का उद्देश्य प्लास्टिक प्रदूषण जैसे गंभीर मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करना है. साथ ही प्लास्टिक कैसे प्रकृति को नुकसान पहुंचा रहा है, उसको लेकर लोगों को सचेत करना. लक्ष्य तय हुआ है कि पृथ्वी के स्वास्थ्य के लिए प्लास्टिक को समाप्त करना है. इसलिए 2040 तक प्लास्टिक के उत्पादन में 60 प्रतिशत की कटौती का लक्ष्य है. साथ ही यह भी समझना होगा कि अपनी धरती को हरा-भरा रखने का दायित्व सिर्फ सरकार और एजेंसियों पर ही नहीं है, बल्कि, हम नागरिकों को भी इसकी चिंता करनी होगी. आगे आकर सक्रियता के साथ काम करना होगा. तभी पृथ्वी दिवस का उद्देश्य पूरा हाेगा.
राज्य से निकल रहा लगभग 74826 मीट्रिक टन प्लास्टिक वेस्ट
सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) की रिपोर्ट के अनुसार राज्य से 2018-19 तक 51454.53 मीट्रिक टन प्लास्टिक वेस्ट प्रति वर्ष निकल रहा था. वहीं 2020 में इस आकड़े में लगभग 45 फीसदी की वृद्धि हो गयी. आंकड़े बताते हैं कि राज्य से प्रति वर्ष 74826.3 मीट्रिक टन प्लास्टिक वेस्ट निकल रहा है. यह पर्यावरण को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाने के लिए काफी है. सरकार भी राज्य में प्लास्टिक वेस्ट को नियंत्रित करने में लगातार विफल हो रही है. शहर में आज भी खुलेआम सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा है. जबकि इसपर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया गया है.
अच्छी पहल : प्लास्टिक से बनायी जा रही सड़क
पथ निर्माण विभाग प्लास्टिक के निदान को लेकर पहल कर रहा है. जमशेदपुर के बाद धनबाद जिले की दो ग्रामीण सड़कों का निर्माण प्लास्टिक वेस्ट मेटेरियल से हुआ है. राजगंज के मानटांड़ से श्यामडीह तक 14 किमी और टुंडी के लोधरिया मोड़ से शहरपुरा तक आठ किमी सड़क प्लास्टिक वेस्ट मेटेरियल से तैयार की गयी है. भारत में ब्लैक टॉप सड़क निर्माण कार्य में सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल किया जा रहा है. धनबाद जिला में ग्रामीण कार्य विभाग की ओर से वित्तीय वर्ष 2023-24 में इस योजना के तहत दो सड़कों का चयन हुआ. सड़क निर्माण आठ करोड़ रुपये खर्च कर पूरा किया गया. दोनों ही सड़कों में 60 फीसदी से अधिक चारकोल और शेष प्लास्टिक का इस्तेमाल किया गया, यह सभी प्लास्टिक रद्दी में फेंके गये सिंगल यूज प्लास्टिक थे.
इन राज्यों में प्लास्टिक पर बैन
पृथ्वी को प्लास्टिक मुक्त किया जाये, इसके लिए केंद्र सरकार ने पहल कर राज्यों में सिंगल यूज प्लास्टिक को बैन करने का निर्देश दिया. निर्देश राज्यभर में जारी किया गया, जबकि प्लास्टिक पर रोक लगाने में नगर-निगम असफल हो रहा है. वहीं बिहार, उत्तर प्रदेश, सिक्किम, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और मेघालय में पूरी तरह प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक लगायी जा चुकी है.
नेट जीरो की पहल करनी होगी
प्रदूषण कम करने के लिए अक्सर कार्बन उत्सर्जन कम करने की बात कही जाती है. जबकि, अब इसके बदले ””””नेट जीरो”””” शब्द का प्रचलन बढ़ गया है. नेट जीरो एमिशन का मतलब ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन शून्य करना नहीं, बल्कि ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को दूसरे कार्यों से बैलेंस करना है. उदाहरण के तौर पर पेड़-पौधे हवा से कार्बन डाइऑक्साइड लेते हैं. यदि किसी कंपनी के कारखाने से कार्बन की एक निश्चित मात्रा का उत्सर्जन होता है और कंपनी इतने पेड़ लगाती है, जो उतना कार्बन ले सके, तो उसका नेट एमिशन जीरो हो जायेगा. इस फॉर्मूला के आने के बाद हर देश पर बराबर जिम्मेदारी होगी.
पलामू में बन रहा पर्यावरण मंदिर
पर्यावरणविद कौशल किशोर जायसवाल पलामू के छत्तरपुर प्रखंड के डाली गांव के रहने वाले हैं. 50 वर्षों से अधिक समय से पर्यावरण की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं. नि:शुल्क 50 लाख से अधिक पौधों का वितरण कर चुके हैं. पर्यावरण के प्रति लोगों में अपनापन का भाव जगे और इसकी रक्षा के लिए लोग आगे आयें, इसको लेकर कौशल डाली गांव में निजी खर्च पर पर्यावरण मंदिर का निर्माण कर रहे हैं. यह एक अनूठा प्रयास है. कौशल का कहना है कि जब पर्यावरण को लेकर लोग आस्था का भाव रखेंगे, तो इसकी रक्षा के लिए आगे आयेंगे. इसलिए पर्यावरण को धर्म के रूप में स्थापित करने के लिए पर्यावरण मंदिर का निर्माण करा रहे हैं.