भगवान बिरसा मुंडा की ‌जिंदगी से हर किसी को सीखनी चाहिए ये 5 बातें

Birsa Munda 125th Death Anniversary : एक साधारण बालक महज 25 साल की उम्र में बिरसा मुंडा से यूं ही भगवान बिरसा मुंडा नहीं बन गये. सादगी, साहस और आदिवासी समाज के प्रति उनके समर्पण ने उनको धरती आबा का दर्जा दिलाया. बिरसा मुंडा (1875-1900) के जीवन में बहुत-सी ऐसी बातें थीं, जिससे आज भी लोग प्रेरणा लेते हैं. बिरसा मुंडा में कई ऐसे गुण थे, जिसे हर किसी को अपने जीवन में आत्मसात करना चाहिए.

Birsa Munda 125th Death Anniversary: एक साधारण बालक महज 25 साल की उम्र में बिरसा मुंडा से भगवान बिरसा मुंडा यूं ही नहीं बन गये. सादगी, साहस और आदिवासी समाज के प्रति उनके समर्पण ने उनको धरती आबा का दर्जा दिलाया. बिरसा (1875-1900) के जीवन में बहुत-सी ऐसी बातें थीं, जिससे आज भी लोग प्रेरणा लेते हैं. उनमें कई ऐसे गुण थे, जिसे हर किसी को अपने जीवन में आत्मसात करना चाहिए.

1. आंदोलनकारी बिरसा मुंडा (Agitator Birsa Munda)

बिरसा मुंडा अलग-अलग विषयों पर लगातार आंदोलन करते रहे. उनकी रणनीतिक क्षमता भी जबर्दस्त थी. वह अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला वार करते थे. कई बार ब्रिटिश सैनिकों को चकमा दिया. एक बार खुद जंगल में छिप गये और अपने अनुयायियों को अलग-अलग दिशाओं में भेजकर ब्रिटिश सैनिकों को भ्रमित कर दिया. जमींदारों और अंग्रेजों की शोषण की नीति के खिलाफ ‘उलगुलान’ करने वाले धरती आबा को वर्ष 1900 में ब्रिटिश सेना ने गिरफ्तार कर लिया.

धरती आबा को पश्चिमी सिंहभूम जिले के बंदगांव से गिरफ्तार कर खूंटी के रास्ते रांची जेल लाया गया. जेल में उन पर कई अमानवीय व्यवहार हुए, लेकिन आंदोलनकारी धरती आबा कभी कमजोर नहीं पड़े. जेल में भी वह अपने साथियों का हौसला बढ़ाते थे. कहते थे, ‘हमारी जमीन और आजादी के लिए यह बलिदान जरूरी है.’ उनकी मृत्यु (9 जून 1900) को जेल में ही हो गयी. अंग्रेजों ने कहा कि आदिवासियों के नायक की जेल में हैजा से मौत हुई है, लेकिन कहते हैं कि अंग्रेजों ने धीमा जहर देकर उनको मार दिया.

2. निडर नेता बिरसा मुंडा (Leader Birsa Munda)

उनकी उम्र जब करीब 20 साल थी, तभी उन्होंने कुशल नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया था. गांव-गांव में घूमकर उन्होंने आदिवासियों को एकजुट करना शुरू किया. रात-रात भर पैदल चलते थे. एक गांव से दूसरे गांव में जाते और लोगों को ब्रिटिश शासन, जमींदारों और मिशनरियों के द्वाा किये जा रहे शोषण के खिलाफ जागरूक करते.

कुछ ही दिनों में वे जन-जन के नेता बन गये. बिरसा के पिता बीमार पड़े, तो परिवार की पूरी जिम्मेदारी उन पर आ गयी. बिरसा मुंडा ने खेतों में काम करना शुरू किया. साथ ही अपने छोटे भाई-बहनों का पालन-पोषण भी किया. पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए उन्होंने गांव की समस्याओं को कभी दरकिनार नहीं किया. यह उनके नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है.

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3. साहसी और निडर बिरसा मुंडा (Brave Birsa Munda)

बचपन में धरती आबा भेड़ चराने जाते थे. एक दिन भेड़ चराते-चराते गहरी नींद में सो गये. आंख खुली, तो देखा कि सामने एक बाघ खड़ा है. बाघ से डरने की बजाय उन्होंने हिम्मत से काम लिया और बाघ को भगाने के लिए शोर मचाने लगे. कुछ ही देर में बाघ वहां से भाग गया. तभी से गांव में उनके साहस की चर्चा होने लगी. बाद में उन्होंने जमींदारों के खिलाफ आंदोलन किया. एक बार एक जमींदार ने उनके गांव के गरीब आदिवासी की जमीन हड़प ली. बिरसा मुंडा ने ग्रामीणों को एकत्र किया और जमींदार के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध शुरू कर दिया. तब वह किशोरावस्था में थे.

4. विद्रोही बिरसा मुंडा (Revolutionary Birsa Munda)

बिरसा मुंडा ने चाईबासा के जर्मन मिशन स्कूल में पढ़ाई की. दबाव में उन्होंने ईसाई धर्म भी अपना लिया. मिशनरी शिक्षकों ने एक बार आदिवासी संस्कृति और विश्वास पर कुछ गलत बोल दिया, जिसे वह बर्दाश्त नहीं कर पाये. उन्होंने खुलकर इसका विरोध किया. इस विद्रोही स्वभाव के कारण उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया, लेकिन उन्होंने आत्मसम्मान और आदिवासी अस्मिता के भाव को नहीं छोड़ा.

5. प्रकृति प्रेमी बिरसा मुंडा (Nature Lover Birsa Munda)

धरती आबा प्रकृति से प्रेम करते थे. अक्सर जंगल में अकेले समय बिताते थे. कहते हैं कि वह पेड़ों, नदियों और पहाड़ों से ‘बातें’ करते थे. एक बार गांव में सूखा पड़ा. उन्होंने आदिवासियों से कहा कि वे जंगल की रक्षा करें और प्रकृति की पूजा करें. इसके बाद गांव में एकता और पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ी. बाद में आदिवासी जंगल के रक्षक बन गये.

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By Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

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