सरना धर्म कोड की मांग पर 30 दिसंबर को भारत बंद, रेल-रोड चक्का जाम करेगा आदिवासी सेंगेल

सेंगेल के प्रमुख सालखन मुर्मू ने कहा कि वर्ष 2011 में जब देश में जनगणना हुई थी, तो उसमें 50 लाख आदिवासियों ने अपना धर्म ‘सरना’ लिखवाया था. उस समय जैन की संख्या 44 लाख थी.

सरना को धर्म की मान्यता देने की मांग पर आदिवासी सेंगेल अभियान (एएसए) ने 30 दिसंबर को भारत बंद का आह्वान किया है. सेंगेल प्रमुख सालखन मुर्मू ने एक दिन के सांकेतिक भारत बंद का आह्वान करते हुए कहा है कि सरना देश के 15 करोड़ आदिवासी (जनजातीय समुदायों) की पहचान है. आदिवासियों के धर्म को मान्यता नहीं देना उनके साथ अन्याय है. एक तरह से संवैधानिक अपराध भी है. सालखन मुर्मू ने बुधवार (27 दिसंबर) को एक बयान जारी कर कहा है कि किसी समुदाय पर दूसरे धर्मों का पालन करने के लिए दबाव बनाना, उन्हें धर्म की दासता स्वीकार करने के लिए बाध्य करने की तरह है. उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दोनों ने ही आदिवासियों को उनकी धार्मिक स्वतंत्रता से वंचित किया है. सेंगेल प्रमुख मुर्मू ने दावा किया कि वर्ष 1951 की जनगणना में सरना धर्म के लिए अलग संहिता थी, लेकिन कांग्रेस ने इसे बाद में समाप्त कर दिया. वहीं, भाजपा अब आदिवासियों को वनवासी और हिंदू बनाने की कोशिश कर रही है.

सरना कोड देने वालों को ही वोट देंगे आदिवासी

सालखन मुर्मू ने कहा कि आदिवासी सेंगेल अभियान आदिवासी समुदाय के हितों को सुरक्षित रखने के पक्ष में है. इसलिए लगातार सरकार से संवैधानिक तरीके से आदिवासियों को उनका धर्मकोड देने की मांग कर रहा है. लोकसभा चुनाव 2024 से पहले सालखन मुर्मू ने कहा है कि आदिवासी समाज उसी पार्टी को वोट देगा, जो सरना धर्म कोड को मान्यता देने की बात करेगी. उन्होंने कहा कि पूरे भारत में आदिवासियों की आबादी करीब 15 कोड़ है. ये लोग प्रकृति की पूजा करते हैं. सरना धर्म कोड उनके अस्तित्व की पहचान का हिस्सा है. आदिवासियों को सरना कोड से वंचित नहीं किया जाना चाहिए. अगर उन्हें सरना कोड नहीं मिलता है, तो यह उनको उनकी धार्मिक आजादी से वंचित करने का प्रयास है. कांग्रेस और भाजपा दोनों ही इसके लिए समान रूप से दोषी हैं.

Also Read: पीएम मोदी की झारखंड यात्रा : सरना कोड नहीं देने पर बिरसा के गांव में आत्मदाह की धमकी देने वाले 4 गिरफ्तार

2011 की जनगणना में 50 लाख लोगों ने अपना धर्म लिखाया ‘सरना’

सेंगेल के प्रमुख ने कहा कि वर्ष 2011 में जब देश में जनगणना हुई थी, तो उसमें 50 लाख आदिवासियों ने अपना धर्म ‘सरना’ लिखवाया था. उस समय जैन की संख्या 44 लाख थी. सरना धर्म कोड के बगैर आदिवासियों को जबरन हिंदू, मुसलमान, ईसाई बनाना जनजातीय समुदाय के लोगों को धार्मिक गुलामी के लिए मजबूर करना है. सालखन मुर्मू ने कहा कि सरना धर्म कोड की मान्यता मानवता और प्रकृति- पर्यावरण की सुरक्षा के लिए भी जरूरी है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री 15 नवंबर 2023 को भगवान बिरसा मुंडा के गांव उलीहातु आए, महामहिम राष्ट्रपति ने 20 नवंबर 2023 को बारीपदा दौरा किया. ये दोनों यात्राएं बेकार साबित हुईं.

Also Read: तो क्या आदिवासियों की मांग नहीं होगी पूरी ? सरना कोड के मुद्दे पर झारखंड सरकार और भाजपा के बीच टकराव

राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री से भी मिली निराशा : सालखन मुर्मू

पूर्व सांसद सालखन मुर्मू ने कहा कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से अपील की गई कि वे सरना धर्म कोड की मान्यता की पहल करें. लेकिन, उनसे भी निराशा हाथ लगी है. अब तक इस दिशा में कोई पहल नहीं हुई है. इसलिए आदिवासी सेंगेल अभियान को अन्य संगठनों के सहयोग से 30 दिसंबर को भारत बंद और रेल-रोड चक्का जाम करने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है. उन्होंने अपील की है कि सरना धर्म लिखाने वाले 50 लाख आदिवासी एवं अन्य सभी सरना धर्म के समर्थक संगठन अपने-अपने गांव के पास एकजुट होकर प्रदर्शन करें. उन्होंने कहा कि झारखंड विधानसभा में 11 नवंबर 2020 को जिन पार्टियों ने धर्म कोड बिल का समर्थन किया था, उन्हें भी सामने आना होगा. अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो उनकी भूमिका भी संदेह के घेरे में होगी.

Also Read: VIDEO: सरना कोड के लिए रांची में महाजुटान, सालखन मुर्मू ने की आदिवासी राष्ट्र की मांग, ऐसा होगा स्वरूप

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >