उच्च शिक्षा की बदहाली-दो: आठ वर्ष में भी नहीं बन सका नीलांबर पीतांबर विश्वविद्यालय का अपना कैंपस

राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षण संस्थानों के जारी सर्वे में झारखंड का एक भी विश्वविद्यालय व अंगीभूत काॅलेज टॉप 100 में अपना स्थान नहीं बना पाया. प्रभात खबर ने राज्य में उच्च शिक्षा की बदहाल स्थिति पर इससे जुड़े विशेषज्ञों से बात की. उनसे यह जानने का प्रयास किया कि राज्य में उच्च शिक्षा में इतने […]

By Prabhat Khabar Digital Desk |
राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षण संस्थानों के जारी सर्वे में झारखंड का एक भी विश्वविद्यालय व अंगीभूत काॅलेज टॉप 100 में अपना स्थान नहीं बना पाया. प्रभात खबर ने राज्य में उच्च शिक्षा की बदहाल स्थिति पर इससे जुड़े विशेषज्ञों से बात की. उनसे यह जानने का प्रयास किया कि राज्य में उच्च शिक्षा में इतने खर्च के बाद भी स्थिति में सुधार क्यों नहीं हो रहा है. देश के टॉप 100 संस्थानों में अपनी जगह क्यों नहीं बना पाये. राज्य व केंद्र सरकार मिला कर विश्वविद्यालय व कॉलेजों पर प्रति वर्ष लगभग 550 करोड़ खर्च करती है. इसके बाद भी विश्वविद्यालय व कॉलेजों का हाल बदहाल क्यों हैं?
मेदिनीनगर /रांची : पलामू में नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय की स्थापना 17 जनवरी 2009 को हुई थी. इस विश्वविद्यालय के अंतर्गत चार अंगीभूत कॉलेज(जीएलए कॉलेज, योधसिंह नामधारी महिला महाविद्यालय, जनता शिवरात्रि कॉलेज मेदिनीनगर व एसएसजेएन कॉलेज गढ़वा) हैं. एक अंगीभूत कॉलेज पर प्रतिवर्ष योजना मद में 10 से 12 करोड़ रुपये तथा गैर योजना मद में 10 से 15 करोड़ रुपये खर्च होते हैं.

यदि दोनों योजना मद को मिला दिया जाये, तो एक अंगीभूत कॉलेज पर प्रतिवर्ष 20 से 25 करोड़ रुपये के बीच खर्च हो रहा है. जीएलए कॉलेज में विद्यार्थियों की संख्या 19 हजार, योधसिंह नामधारी महिला महाविद्यालय में छह हजार, जनता शिवरात्रि कॉलेज में पांच हजार तथा एसएसजेन कॉलेज गढ़वा में पांच हजार है. आठ वर्ष बाद भी विश्वविद्यालय को स्थायी कैंपस नहीं मिल पाया है. इस क्षेत्र में इंजीनियरिंग/मेडिकल कॉलेज का अभाव है. यहां के कॉलेजों में शिक्षकों की भी कमी है. चारों अंगीभूत कॉलेजों में एक भी स्थायी प्राचार्य नहीं है.

क्या कहते हैं विशेषज्ञ
सेवानिवृत्त प्रोफेसर सुभाषचंद्र मिश्र का कहना है कि विवि की स्थापना के आठ वर्ष बाद भी अपेक्षित विकास नहीं हुआ. शिक्षक नहीं हैं. शैक्षणिक विकास हो इसके लिए करोड़ों रुपये प्रतिवर्ष खर्च हो रहे हैं, लेकिन काॅलेज व विवि का विकास कैसे हो, इसे लेकर कोई रोडमैप तैयार नहीं किया गया है. विवि के पदाधिकारियों के बीच समन्वय का अभाव है. शोध को बढ़ावा देने के लिए कोई काम नहीं किया गया. पाठ्यक्रम के गुणवत्तापूर्ण होने की बात की जाती है, लेकिन अभी तक यहां के पाठ्यक्रम में कोई बदलाव नहीं किया है. एचआरडी द्वारा जो मानक तैयार किया गया है, उस दृष्टिकोण से देखा जाये तो यहां बेहतर कार्य नहीं रहा है. काॅलेजों में सुधार होना चाहिए, लेकिन यहां इस पर अपेक्षित ध्यान नहीं है. अभी के जो हालात हैं, उससे तो यही माहौल बना है कि कुछ भी बेहतर नहीं हो सकता.
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