झारखंड की 5 महिला स्वतंत्रता सेनानी, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की ईंट से ईंट बजा दी

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में झारखंड की महिलाओं का योगदान अतुलनीय रहा है. फूलो-झानो, सरस्वती देवी, सुशीला समद, ननीबाला गुहा और माकी मुंडा जैसी वीरंगनाओं ने आजादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया.

Jharkhand Female Freedom Fighters, रांची : भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास जब भी लिखा जाएगा तो उसमें झारखंड का जिक्र किए बिना पूरा नहीं हो सकता. क्योंकि यहां के अनेक गैर जनजातीय नायकों और नायकों ने अंग्रेजों से लोहा लेते वक्त ब्रिटिश हुकूमत की ईंट से ईंट बजा दी थी. लेकिन झारखंड के स्वतंत्रता सेनानियों का जब भी जिक्र होता है तो बिरसा मुंडा, सिदो कान्हू का जिक्र होता है. लेकिन जितना योगदान पुरुषों का था उतना ही योगदान इस माटी की महिलाओं का भी है. 1855 के संथाल हुल से लेकर बिरसा मुंडा के उलगुलान और महात्मा गांधी के सत्याग्रह तक, झारखंड की महिलाओं ने त्याग, नेतृत्व और अदम्य साहस की अद्वितीय मिसाल पेश की. आइए जानते हैं झारखंड की उन 5 प्रमुख महिला स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में, जिनके योगदान ने देश की आजादी की राह को रोशन किया.

फूलो-झानो ने मिलकर उतार दिया था 21 अंग्रेजों को मौत के घाट

संथाल परगना की धरती पर 1855 में हुए ऐतिहासिक 'संथाल हुल' (संथाल विद्रोह) में सिदो, कान्हू, चांद और भैरव के साथ उनकी दो सगी बहनों फूलो मुर्मू और झानो मुर्मू का योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है. जब अंग्रेजों और महाजनों के अत्याचार के खिलाफ युद्ध छिड़ा, तो फूलो और झानो ने सैकड़ों महिलाओं का संगठन बनाया. भागलपुर के पास पाड़ा मैदान में हुए युद्ध के दौरान, जब अंग्रेजी सेना सो रही थी, तब दोनों बहनों ने कुल्हाड़ी और तलवार से 21 ब्रिटिश सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था. मातृभूमि की रक्षा के लिए लड़ते हुए दोनों बहनें शहीद हो गईं, जिनकी शहादत आज भी झारखंड के जन-मन में रची-बसी है.

सरस्वती देवी: स्वतंत्रता आंदोलन में जेल जाने वाली संयुक्त बिहार की पहली महिला

हजारीबाग की धरती पर जन्म लेने वाली सरस्वती देवी का नाम झारखंड के स्वतंत्रता आंदोलन में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है. 5 फरवरी 1901 को जन्मीं सरस्वती देवी ने समाज में व्याप्त रूढ़ियों और कुरीतियों के खिलाफ न केवल आवाज उठाई, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम में भी महिलाओं का नेतृत्व किया. वे संयुक्त बिहार (उस वक्त बिहार झारखंड अलग नहीं हुआ था) की पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी थीं, जिन्हें अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर जेल भेजा था. वर्ष 1920 के असहयोग आंदोलन, 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने हजारीबाग और आसपास के क्षेत्रों में हजारों लोगों को संगठित किया और कई बार जेल की यातनाएं सही.

ये भी पढ़ें: टाटा स्टील ने JFC को बेचा! सिर्फ 100 रुपये में हुई डील फाइनल, जानें किसने किया टेकओवर

सुशीला समद प्रखर कवयित्री होने के साथ साथ स्वतंत्रता सेनानी भी थी

सिंहभूम की मुंडा आदिवासी समुदाय से आने वाली सुशीला समद बहुमुखी प्रतिभा की धनी थीं. वे देश की पहली आदिवासी महिला थीं, जिन्होंने 'विदुषी' (विद्वान) की उपाधि प्राप्त थी. हिंदी की प्रखर कवयित्री, पत्रकार और प्रकाशक होने के साथ-साथ वे एक निर्भीक स्वतंत्रता सेनानी थीं. इलाहाबाद के प्रयाग महिला विद्यापीठ से शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने अपनी कलम और भाषणों से आदिवासी समाज की महिलाओं को राजनीतिक रूप से जागरूक किया. महात्मा गांधी के 1930 के दांडी मार्च के दौरान सुशीला समद ने झारखंड के वनांचल क्षेत्रों में आदिवासी महिलाओं को गोलबंद कर सविनय अवज्ञा आंदोलन में अभूतपूर्व भूमिका निभाई.

ननीबाला गुहा: जमशेदपुर में नमक सत्याग्रह की अगुआ

औद्योगिक नगरी जमशेदपुर और पूर्वी सिंहभूम के क्षेत्र में स्वतंत्रता संग्राम की अलख जगाने का श्रेय ननीबाला गुहा को जाता है. वर्ष 1930 में जब महात्मा गांधी ने ब्रिटिश हुकूमत के नमक कानून के खिलाफ देशव्यापी सत्याग्रह शुरू किया, तब ननीबाला गुहा ने जमशेदपुर क्षेत्र में सत्याग्रह का मोर्चा संभाला. उन्होंने न केवल महिलाओं को घर की चौखट से बाहर निकालकर विदेशी कपड़ों के बहिष्कार और नमक बनाने के आंदोलन से जोड़ा, बल्कि अंग्रेजी सरकार की पुलिसिया बर्बरता के सामने डटकर खड़ी रहीं. उनके नेतृत्व ने पूरे कोल्हान और छोटानागपुर क्षेत्र की महिलाओं को राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा से जोड़ दिया.

माकी मुंडा: डोमबारी बुरु की लड़ाई में अंग्रेजों से लोहा लेने वाली योद्धा

भगवान बिरसा मुंडा के 'उलगुलान' (महाविद्रोह) में महिलाओं की भूमिका भी अहम रही थी और इनमें सबसे प्रमुख नाम माकी मुंडा का है. माकी मुंडा, बिरसा मुंडा के प्रमुख सहयोगी गया मुंडा की पत्नी थीं. 1899-1900 के दौर में जब अंग्रेजों ने डोमबारी बुरु (खूंटी) की पहाड़ियों को चारों तरफ से घेर लिया था, तब माकी मुंडा ने अपने हाथों में टांगी और तीर-धनुष उठाकर ब्रिटिश सेना का सामना किया था. गोलियों की बौछार के बीच अपने बच्चों को पीठ पर बांधकर अंग्रेजों से लड़ने वाली माकी मुंडा की शहादत और अदम्य साहस आज भी झारखंड की लोकगाथाओं में अमर है.

ये भी पढ़ें: देवघर से बिहार जा रही कांवरियों से भरी बस ट्रक से टकराई, 3 लोगों की मौत; 15 की हालत गंभीर


प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By समीर उरांव

इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.

Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >