बच्चे अपने साथ घर ले जाते हैं पुस्तकालय

अनूठा प्रयोग : एक शिक्षिका बच्चों में जगा रही है पढ़ने की ललकयह कहानी है गुजरात के एक सरकारी स्कूल की शिक्षिका की, जिनके लिए उनका काम एक मिशन है, न कि सिर्फ एक नौकरी. उन्होंने अपनी कोशिशों से बच्चों के लिए पुस्तकालय व वाचनालय परियोजना शुरू की है. सामाजिक व आर्थिक रूप से कमजोर […]

By Prabhat Khabar Digital Desk |

अनूठा प्रयोग : एक शिक्षिका बच्चों में जगा रही है पढ़ने की ललकयह कहानी है गुजरात के एक सरकारी स्कूल की शिक्षिका की, जिनके लिए उनका काम एक मिशन है, न कि सिर्फ एक नौकरी. उन्होंने अपनी कोशिशों से बच्चों के लिए पुस्तकालय व वाचनालय परियोजना शुरू की है. सामाजिक व आर्थिक रूप से कमजोर तबकों से आनेवाले बच्चे पढ़ना तो चाहते हैं, लेकिन उनके पास किताबें खरीदने के लिए पैसे नहीं होते. इन बच्चों के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं है.सेंट्रल डेस्कहमें अपने आसपास कई ऐसे शिक्षक मिल जायेंगे, जो अपना दायित्व पूरी निष्ठा से निभाते हैं. उनकी दिनचर्या में विद्यार्थियों को पढ़ाना, परीक्षा लेना, उन्हें नंबर देना और घर जाकर आराम करना शामिल होता है. वहीं, कुछ शिक्षक ऐसे भी हैं जिन्होंने अपना दिल, अपनी आत्मा तक शिक्षा को समर्पित कर दी है. ऐसी ही एक शिक्षिका हैं, गुजरात के गांधीनगर की प्रीति गांधी, जो कलोल प्राइमरी स्कूल की प्रधानाचार्य हैं. उन्होंने अपने सरकारी स्कूल के बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने के मकसद से नि:शुल्क पुस्तकालय परियोजना शुरू की है. इस पुस्तकालय में खास बात यह है कि बच्चे इसे अपने साथ घर ले जाते हैं और वह उनके साथ महीने भर रहता है.किताबों की अहमियत बताते हुए प्रीति कहती हैं कि ये हमारी सबसे अच्छी दोस्त होती हैं. इनसे आपको न केवल नयी जानकारियां मिलती हैं, बल्कि ये आपकी भाषा और कल्पना शक्ति को भी समृद्ध करती हैं. बच्चों को किताबों से दोस्ती कर लेनी चाहिए. कलोल तालुका में बच्चों के लिए कोई पुस्तकालय नहीं था. और, प्रीति अपने स्कूल में जिन बच्चों को पढ़ाती थीं, उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे किताबें खरीद कर पढ़ सकें. ऐसे में उन्हें एक आइडिया आया.बक्सों में किताबेंउन्होंने बाजार से एल्युमिनियम का एक छोटा बक्सा खरीद कर उसमें अलग-अलग विषयों की 20 किताबें रखीं. इस बक्से को उन्होंने अपने एक छात्र को एक महीने के लिए पढ़ने को दिया. एक महीने बाद जब उसने किताबें पढ़ कर लौटायीं, तो फिर उन्होंने उस बक्से को अगले महीने दूसरे छात्र को दिया. धीरे-धीरे प्रीति ऐसे 54 बक्से तैयार कर लिये, जिनमें 20-20 किताबों के सेट हैं. इन्हें वे हर छात्र को एक -एक महीने के लिए देती हैं. बक्सों में किताबें रखने की वजह प्रीति यह बताती हैं कि इससे बच्चे अपने घरों में इन किताबों को चूहे, कीड़े वगैरह से बचा सकेंगे. प्रीति गांधी की इस अनूठी परियोजना को धीरे-धीरे बड़ी पहचान मिल गयी. कई व्यक्ति और संस्थान वित्तीय सहायता देने के लिए सामने आने लगे हैं.150 बच्चों को हुआ फायदाबक्सों में चलते-फिरते पुस्तकालय से फिलहाल लगभग 150 बच्चों को फायदा हुआ है. प्रीति इस संख्या को और बढ़ाना चाहती हैं. वह कहती हैं कि संसाधनों की कमी की वजह से हम हर बच्चे तक किताबें पहुंचा नहीं पा रहे हैं, लेकिन हमारी हर संभव कोशिश है कि हर बच्चा इससे लाभान्वित हो. अपने इसी प्रयास की बदौलत, प्रीति को गुजरात के सरकारी स्कूलों में अनूठा प्रयोग करनेवाले सौ शिक्षकों की सूची में जगह मिली है.परती जमीन पर वाचनालयप्रीति ने एक परती पड़ी जमीन को वाचनालय के रूप में विकसित किया है. रंग-बिरंगी दीवारों पर लगे तरह-तरह की सीख देते पोस्टरों के बीच, मेज और कुरसियों से सजे इस वाचनालय में अनेक विषयों की किताबें हैं. यहां बच्चे बेझिझक कोई भी किताब उठा कर पढ़ सकते हैं. किसने कितना पढ़ा और सीखा, इसे जानने के लिए हर महीने के अंत में टेस्ट भी होता है.प्रीति बताती हैं कि उनके इन प्रयासों से बच्चों में पढ़ने-लिखने की एक नयी ललक जगी है. स्कूल में जो चीजें पढ़नी होती हैं, उनके बारे में वे पहले से जान रहे होते हैं, इसलिए उमंग के साथ कक्षाओं में नियमित रूप से आते हैं. यही नहीं, बच्चों का भाषा ज्ञान भी बेहतर हुआ है. वह कहती हैं, ”मैं हमेशा से कुछ ऐसा करना चाहती थी, जिससे ज्यादा से ज्यादा बच्चों को फायदा हो. पति योगेश आचार्य के सहयोग से मैं अपनी इस पहल को इस मुकाम तक ला पायी.”प्रीति गांधी और उनके इस प्रयास के बारे मेें ज्यादा जानने के लिए आप उनसे ‘ं’ङ्म’स्र१्रें१८२ूँङ्मङ्म’ल्लङ्म9@ॅें्र’.ूङ्मे पर संपर्क कर सकते हैं.

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