हर साल कांवड़ ले जाती हैं 100 साल की माता बम

रांची : नाम- उमा सरावगी उम्र- 100 के पार, जोश इतना कि 25 साल के युवा शरमा जाएं, रेलवे स्टेशन पर जैसे ही चुनरी प्रिंट साड़ी में पहुंची , जोर- जोर से बोल बम का नारा लगाने लगी. आसपास खड़े यात्री भी माता का उत्साह देखकर हैरान थे. उनके साथ आया कावड़ियों का जत्था भी […]

रांची : नाम- उमा सरावगी उम्र- 100 के पार, जोश इतना कि 25 साल के युवा शरमा जाएं, रेलवे स्टेशन पर जैसे ही चुनरी प्रिंट साड़ी में पहुंची , जोर- जोर से बोल बम का नारा लगाने लगी. आसपास खड़े यात्री भी माता का उत्साह देखकर हैरान थे. उनके साथ आया कावड़ियों का जत्था भी माता को बोल बम के नारे में साथ देने लगा.

रांची रेलवे स्टेशन 100 से ज्यादा कावड़ियों के नारों से गूंज उठा. सावन में यह दृश्य पहली बार नहीं है, माता बम के नाम से मशहूर उमा सरावगी हर साल बाबाधाम जाती है.
सुलतानगंज से जल लेती हैं और बाबा को चढ़ाती हैं. सरस सत्संग मंडल ग्रुप के साथ उमा जुड़ी हैं और इस ग्रुप के लोग हर साल माता बम के रूप में उमा को ले जाते हैं. हमने पूछा माता आप कितनी बार बाबाधाम गयीं है. इस सवाल पर कहतीं हैं, भई हमको याद नहीं है, पन जाते बहुत दिन से हैं. उम्र कितनी है, उम्र तो भगवान जाने भोलेनाथ. ग्रुप के सदस्य बताते हैं कि माता 100 सावन से ज्यादा देख चुकीं हैं और बहुत दिनों से बाबा के दरबार जा रहीं हैं
ग्रुप में 25 महिलाएं हैं और सभी मिलकर उमा का ध्यान रखती हैं. ग्रुप की महिलाएं कहती हैं, इनकी वजह हम में उत्साह आता है . साल 1974 में स्थापित सरस सत्संग मंडल की 48 वीं कांवर यात्रा है जो सुल्तानगंज से देवघर के लिए 13 जुलाई को दोपहर 2.30 बजे वनांचल एक्सप्रेस से सुल्तानगंज के लिए प्रस्थान कर रही है. सदस्य कहते हैं हम इन्हें नहीं ले जाते बल्कि माता हमें ले जाती हैं. छह महीने पहले से ही हम सभी उत्साहित रहते हैं. माता जीस तो पहले से पूछती रहती है कि कब निकलना है.
उमा सरावगी सिर्फ सावन के वक ही इतने उत्साह में नहीं रहती पहाड़ी मंदिर की 400 से ज्यादा सीढ़ियां भी माता चढ़ जाती हैं. उनके साथ कावंर लेकर जा रहे लोग बताते हैं कि, सावन में बाबाधाम से वापस आने के बाद वह अगर बेटे दामाद से कुछ पैसा मिला, तो दूसरों पर खर्चा कर देती हैं. सावन में पहाड़ी मंदिर में जाकर ठंडई, शरबत पिलाती हैं. जोर – जोर से आवाज देती हैं, शरबत है बम, ठंडई हैं बम . माता मारवाड़ी भवन के पीछे रहतीं हैं.इनके साथ पूरा परिवार रहता है. जब माता वनांचल एक्सप्रेस का इंतजार कर रहीं हैं तो भजन सुनकर उनके चेहरे पर मुस्कान बिखर जाती है. भजन में ताली बजाकर साथ देती हैं, कभी धीमी आवाज में गुनगुनाती हैं. थोड़ी देर में चॉकलेट का एक बड़ा पैकेट उनके हाथ में होता है और हमारी तरफ इशारा करके कहतीं है, ऐ….. कैमरा, हम मुड़ते हैं तो हाथ से इशारा करके हमें पास बुलाकर दो – दो चॉकलेट हाथ में पकड़ा देती हैं…
माता के साथी
इस समूह में 25 से ज्यादा महिलाएं और 100 पुरुष हैं. गोविंद अग्रवाल बताते हैं कि हम सभी एक परिवार की तरह हैं. सब साथ जाते हैं, तीन महीने पहले ही टिकट की बुकिंग हो चुकी है. हमारा कुक, खाने का सामान सब बस से सुल्तानगंज पहुंच रहे हैं. हमारे साथ भजन मंडली चलती है दोपहर और शाम हम भजन करते हैं. हमें सुल्तानगंज से 4 दिन लगते हैं बाबाधाम पहुंचने में. माता अगर चल नहीं पाती तो इस ग्रुप का कोई भी साथी उन्हें अपनी पीठ पर बिठा लेता है. हम हर साल इसी उत्साह में रहते हैं. माता का साथ रहता है तो सब में जोश बना रहता है.

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