संजय
रांची : केंद्र सरकार ने पायलट प्रोजेक्ट के तहत थैलीसीमिया व सिकल सेल की स्क्रिनिंग (जांच) के लिए झारखंड को 82 लाख रुपये उपलब्ध कराये हैं.
गुमला जिले में यह पायलट प्रोजेक्ट शुरू होना है, जिसके तहत 17 हजार गर्भवती महिलाअों तथा उनके बच्चों की स्क्रिनिंग का लक्ष्य रखा गया है. पर एनएचएम के अधिकारी इस योजना के लागू होने में अड़चन बने हुए हैं. गत पांच माह से स्क्रिनिंग करने वाली कंपनी (जेनसिन) के साथ एमअोयू की फाइल इधर से उधर दौड़ रही है. एक अधिकारी की टिप्पणी थी कि पैसा केंद्र का है, उसने ही नोडल कंपनी भी चयनित कर दी है, जिले का चयन हो गया है. पर राज्य के अधिकारियों को ही इससे परेशानी है. एेसे में जनजातियों के हित में बनी यह महत्वपूर्ण योजना लागू नहीं हो पा रही.
गौरतलब है कि सिकल सेल बीमारी जनजातीय समुदाय में अधिक पायी जाती है. इस प्रोजेक्ट के लिए केंद्र सरकार द्वारा चयनित कंपनी एक मशीन (जेनेटिक पैनल) लगायेगी, जिससे खून के सैंपल डालते ही उसका पूरा विश्लेषण हो जायेगा तथा संबंधित व्यक्ति के थैलीसीमिया व सिकल सेल से प्रभावित होने संबंधी जानकारी मिल जायेगी.
क्या है सिकल सेल: सिकल सेल रोग में लाल रक्त कण कड़ा व चिपचिपा हो जाता है तथा इसका आकार हंसुए (सिकल) की तरह हो जाता है, इसलिए इसे सिकल सेल कहते हैं. सिकल रोग से प्रभावित मां-बाप से उनके बच्चे को भी यह रोग मिलता है. पति-पत्नी दोनों सिकेल प्रभावित हों, तो बच्चे में भी इसकी संभावना बढ़ जाती है.
सिकल सेल के लक्षण व इससे परेशानी : संक्रमण की ज्यादा संभावना व प्रभाव, एनिमिया, हाथ-पैर में दर्द व सूजन, निमोनिया, छाती में दर्द, खांसी, सांसों में तकलीफ व बुखार, मस्तिष्क आघात की संभावना, पीलिया तथा पांव में नासूर (घाव) होना. इसके अलावा स्वास्थ्य संबंधी कई अन्य समस्याएं भी होती हैं.
क्या है थैलीसीमिया : इस बीमारी से ग्रसित व्यक्ति का शरीर यदि कहीं से कट जाये, तो खून बहना बंद नहीं होता है. एेसी परिस्थिति में खून की कमी होने पर मरीज को खून चढ़ाने की नौबत आ जाती है.
