रांची : महिला किसानों को स्वावलंबी बना रहीं भरनो की गुड्डी कुजूर

रांची : ग्रामीण महिलाओं को अक्सर कमतर आंका जाता है. गांवों में संभावनाओं के बंद द्वार उनका हुनर सामने नहीं आने देते. उनकी काबिलियत घर की देहरी से बाहर नहीं निकल पाती है. जेएसएलपीएस (झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी) के मार्गदर्शन में ग्रामीण महिलाएं न सिर्फ खुद की जिंदगी बदल रही हैं, बल्कि अपने परिवार […]

रांची : ग्रामीण महिलाओं को अक्सर कमतर आंका जाता है. गांवों में संभावनाओं के बंद द्वार उनका हुनर सामने नहीं आने देते. उनकी काबिलियत घर की देहरी से बाहर नहीं निकल पाती है. जेएसएलपीएस (झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी) के मार्गदर्शन में ग्रामीण महिलाएं न सिर्फ खुद की जिंदगी बदल रही हैं, बल्कि अपने परिवार का बेहतर पालन-पोषण करने के साथ-साथ समाज की अन्य महिलाओं को भी हुनरमंद बनाते हुए स्वावलंबी बना रही हैं. ऐसी ही महिला गुड्डी कुजूर से आपको रूबरू करा रहे हैं़ पेश है शृंखला की दूसरी कड़ी.
रांची : गुमला जिले के भरनो प्रखंड अंतर्गत रायकेरा गांव की आजीविका वनोपज मित्र गुड्डी कुजूर ग्रामीण महिला लाह किसानों की जिंदगी बदल रही हैं. पहले गांव में लाह के पेड़ तो थे, लेकिन जागरूकता के अभाव में लाह की खेती नहीं होती थी. अब गांव की महिला किसान लाह की खेती से जीवन स्तर में बखूबी सुधार कर रही हैं.
महिला किसानों का बदल रहा जीवन स्तर : इंटर पास गुड्डी कुजूर गांव की 15 महिला किसानों को वैज्ञानिक तरीके से लाह की खेती का गुर सीखा रही हैं. इसका फायदा भी हुआ है. महिला किसानों का न सिर्फ लाह का उत्पादन बढ़ा है, बल्कि उनकी आमदनी भी बढ़ी है. इससे उनका जीवन स्तर में सुधार हो रहा है.
अब बेर के पेड़ों पर उगता है लाह : गांव में बेर, कुसुम और पलाश के करीब 100 पेड़ हैं. पहले इन पेड़ों का कोई उपयोग नहीं किया जाता था. बेर को लोग सिर्फ खाते थे.
गांव में लाह की खेती नहीं होती थी. पर, आजीविका वनोपज मित्र बनने के बाद गुड्डी ने गांवों में महिला समूह बनायी. महिलाओं को वैज्ञानिक तरीके से लाह की खेती करने का गुर सिखायीं. इसका लाभ भी मिला और अब गांव की महिलाएं लाह का अच्छा उत्पादन कर रही हैं.
दूसरी महिलाओं की जिंदगी भी संवार रही हैं गुड्डी : झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी से जुड़ने के बाद गुड्डी कुजूर को नयी रोशनी मिली.
पहले सिर्फ घर के कामकाज में ही उलझी रहती थीं, लेकिन अब घर के बाहर बैठकों में शामिल होने, बैठक कराने व महिलाओं को प्रशिक्षित कर खुशी होती हैं. इससे न सिर्फ समाज में पहचान मिली है, बल्कि आत्मविश्वास भी बढ़ा है. हुनर से स्वावलंबी बनने में मदद मिली है.

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