बेतला नेशनल पार्क से संतोष कुमार की रिपोर्ट
पलामू. झारखंड का एकमात्र पलामू टाइगर रिजर्व इन दिनों न सिर्फ बाघों के पुनर्वास को लेकर चर्चा में है, बल्कि जंगल क्षेत्र में सदियों से रह रहे आदिवासियों और आदिम जनजाति के परिवारों का जीवन स्तर सुधारने की दिशा में एक नई मिसाल पेश कर रहा है. पीटीआर प्रबंधन का मानना है कि स्थानीय समुदायों के सहयोग के बिना वनों और वन्यजीवों का संरक्षण अधूरा है.
जनभागीदारी से वन संरक्षण
इसी सोच के साथ ''जनभागीदारी से वन संरक्षण'' का एक बड़ा अभियान चलाया जा रहा है. पलामू टाइगर रिजर्व में आदिवासियों और आदिम जनजातियों के जीवन स्तर को सुधारने और बाघ संरक्षण में उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रबंधन द्वारा बड़े पैमाने पर काम किया जा रहा है. हुनर से रोजगार अभियान की शुरुआत की गयी है.
जीवनशैली और आजीविका पर विस्तृत सर्वे
पीटीआर प्रबंधन वर्तमान में जंगल में रहने वाले आदिवासियों की आजीविका, उनकी पारंपरिक इंजीनियरिंग और आर्थिक गतिविधियों पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रहा है. इस सर्वे का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि आदिवासियों के पारंपरिक हुनर (जैसे बांस शिल्प, औषधीय ज्ञान) को आधुनिक बाजार से जोड़कर उन्हें सीधे कैसे आर्थिक लाभ पहुंचाया जा सके.
जाली मॉडल से बढ़ी महुआ संग्रहकर्ताओं की आय
वनवासियों की आय का एक बड़ा जरिया महुआ का संग्रह है. पहले ग्रामीण महुआ चुनने के लिए जंगलों में आग लगा देते थे, जिससे वन्यजीवों को नुकसान होता था.पीटीआर प्रबंधन ने इसे बदलने के लिए जाली मॉडल की शुरुआत की है.इसके तहत पेड़ों के नीचे जाल बिछाये जाते हैं, जिससे आदिवासियों को बिना आग लगाये साफ और उच्च गुणवत्ता वाला महुआ मिलता है.इससे जहां एक तरफ जंगल सुरक्षित हुए हैं, वहीं आदिवासियों को महुआ के बेहतर दाम मिल रहे है.
बाघ दीदी और वनजीवी दीदी से महिला सशक्तीकरण
महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के लिए वनजीवी दीदी और बाघ दीदी जैसी विशेष योजनाओं की शुरुआत की गयी है. इसके तहत चिन्हित गांवों की शिक्षित महिलाओं को ''कम्युनिटी एंबेसडर'' बनाया गया है. ये महिलाएं न केवल ग्रामीणों को वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूक कर रही हैं, बल्कि पर्यावरण-पर्यटन के जरिए रोजगार भी पा रही हैं.
बाघ देवता और सांस्कृतिक धरोहर का सम्मान
आदिवासियों की धार्मिक आस्था को संरक्षण का माध्यम बनाते हुए पीटीआर ने बाघ देवता पहल शुरू की है.गांवों में स्थित ''सरना स्थल'' और ''पवित्र उपवनों'' के संरक्षण के लिए आदिवासियों के साथ साझेदारी की गयी है.आदिम जनजातियों की लोककथाओं में बाघ को रक्षक माना जाता है, इसी आस्था को सम्मान देकर वन विभाग ग्रामीणों और वनकर्मियों के बीच की दूरी को पाट रहा है.
जंगल कैंप'' और स्थानीय युवाओं को रोजगार
पीटीआर द्वारा आयोजित किये जा रहे ''जंगल कैंप'' के माध्यम से पर्यटकों को आदिवासी परिवेश, उनकी अनूठी संस्कृति और खान-पान से रूबरू कराया जा रहा है. इस पहल से स्थानीय आदिवासी युवाओं को टूरिस्ट गाइड, ट्रैकिंग एक्सपर्ट और होम-स्टे के संचालन के जरिए आजीविका के नए साधन मिले हैं.
स्वेच्छा से विस्थापन पर मिल रहा है ऐतिहासिक पैकेज
जंगल के कोर एरिया में रहने वाले ग्रामीणों को बेहतर नागरिक सुविधाएं देने के लिए नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी की गाइडलाइंस के तहत विस्थापन की प्रक्रिया जारी है. हाल ही में कोर जोन में स्थित ''जैगीर'' गांव का पूरी तरह सफल विस्थापन किया गया है. विस्थापित परिवारों को पोलपोल के पास 75 एकड़ जमीन पर बुनियादी सुविधाओं (सड़क, बिजली, परिवहन) के साथ बसाया जा रहा है और प्रति परिवार ₹15 लाख तक का मुआवजा या भूमि विकल्प दिया गया है. इससे इंसानी दखल कम होने से वन्यजीवों को खुला क्षेत्र मिला है और आदिवासियों को मुख्यधारा की बेहतर सुविधाएं मिल रही हैं.
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जीवन स्तर सुधार से बचेंगे जंगल और जानवर
पलामू टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर प्रजेश कांत जेना ने कहा कि बाघ और जंगल का संरक्षण केवल वन विभाग के बल पर संभव नहीं है. जब तक हम जंगल क्षेत्र में रहने वाले अपने आदिवासी भाई-बहनों के जीवन स्तर को नहीं सुधारेंगे, तब तक स्थायी बदलाव नहीं आ सकता. हमारी योजनाएं आदिवासियों की परंपराओं को बचाते हुए उन्हें आर्थिक रूप से समृद्ध करने की है.पलामू टाइगर रिजर्व इसे लेकर पूरी सक्रियता से काम कर रहा है.
