जन अदालत से जन संवाद तक, बदली पलामू की तस्वीर

बुलेट से बैलेट तक : नक्सल हिंसा से विकास की राह पर पलामू

बुलेट से बैलेट तक : नक्सल हिंसा से विकास की राह पर पलामू प्रभात खबर टीम, मेदिनीनगर एक समय था जब विश्व मानचित्र पर पलामू प्रमंडल की पहचान नक्सली गतिविधियों के कारण होती थी. आए दिन नक्सलियों का तांडव, पुलिस–नक्सली मुठभेड़ और जन अदालतों की खबरें सुर्खियों में रहती थीं. सुदूरवर्ती इलाकों में विकास कार्य ठप थे और नक्सलियों के फरमान पर सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता था. लेकिन समय के साथ पुलिस की सख्ती, प्रशासन की रणनीति, सरकार की आत्मसमर्पण नीति और जन जागरूकता अभियानों ने तस्वीर बदल दी. आज वही पलामू विकास, सुरक्षा और लोकतंत्र की नयी मिसाल बन रहा है. डर के साये से निकलकर विकास की ओर गांव नक्सलियों के प्रभाव में रहे गांवों की सूरत अब बदल चुकी है. जहां पहले खौफ का माहौल था, वहां अब सड़कें, बिजली, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, पुलिस थाना और पिकेट नजर आते हैं. पक्की सड़कों के निर्माण से शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रही हैं. पुलिस की नियमित गश्ती और पिकेट से ग्रामीणों में सुरक्षा की भावना बढ़ी है. नक्सल गढ़ माने जाने वाले इलाकों में अब लोग बेखौफ होकर मतदान कर रहे हैं और बुलेट की जगह बैलेट से अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं. पहले नक्सलियों की जन अदालत, अब प्रशासन का जन संवाद हुसैनाबाद अनुमंडल क्षेत्र में दो दशक पहले उग्रवादियों का फरमान ही कानून होता था. महुदंड पंचायत नक्सलियों का प्रमुख अड्डा था, जहां जन अदालतें लगती थीं. लोग भय के साये में जीवन1984 में मोहम्मदगंज से शुरू हुई नक्सली हत्याओं का सिलसिला वर्षों तक चला। स्कूल और सरकारी भवनों को डायनामाइट से उड़ाया गया. जंगल, पहाड़ और दुर्गम रास्तों के कारण यह इलाका नक्सलियों का सेफ जोन बन गया . थालेकिन 2017 में विशेष अभियान के तहत पुलिस पिकेट की स्थापना हुई. तत्कालीन डीसी अमित कुमार और एसपी इंद्रजीत महथा ने बाइक से पहुंचकर इसका उद्घाटन किया.इसके बाद सड़क निर्माण को गति मिली और हालात तेजी से बदले। अब पूजा–त्योहार और सांस्कृतिक कार्यक्रम खुले माहौल में आयोजित हो रहे हैं। लोग अमन-चैन से जीवन जी रहे हैं. गोलियों की गूंज वाला इलाका बना शिक्षा का हब 90 के दशक में बिश्रामपुर थाना क्षेत्र नक्सलियों की समानांतर सरकार के लिए जाना जाता था. एक ऐलान पर बाजार और दफ्तर बंद हो जाते थे. नक्सलियों ने टावर उड़ाए, पंचायत भवनों को निशाना बनाया और जन अदालतों में हत्याएं कीं. बिश्रामपुर थाना और प्रखंड कार्यालय पर भी हमले हुए. पुलिस–नक्सली मुठभेड़ों में कई नक्सली मारे गये. झारखंड अलग राज्य बनने के बाद सरकार और पुलिस ने रणनीति बदली। नए थाना और ओपी बने, सड़क और पुल निर्माण शुरू हुआ। नक्सलियों की पकड़ कमजोर होती गई और क्षेत्र से उनका लगभग सफाया हो गया. इसी बीच विश्वविद्यालय की स्थापना से बिश्रामपुर आज शिक्षा का हब बन चुका है. छतरपुर : नक्सल चर्चा से विकास की पहचान नक्सली गतिविधियों के कारण छतरपुर लंबे समय तक चर्चा में रहा. कई पंचायतों में दिनदहाड़े जन अदालतें लगती थीं. लेकिन प्रशासन के अथक प्रयास और नक्सल विरोधी अभियानों से आतंक का लाल पट्टा धीरे-धीरे हट गया. आज छतरपुर एक विकासशील क्षेत्र के रूप में उभर रहा है. निर्माण कार्यों और व्यवसाय को नया आयाम मिला है। फोरलेन हाइवे बनने से आवागमन भी सुगम हुआ है. कंधे पर हथियार लेकर घूमते थे नक्सली, अब अमन-चैन का माहौल पांडू क्षेत्र कभी नक्सल प्रभावित इलाका था। दिन में भी नक्सली हथियार लेकर घूमते थे और दहशत का माहौल बना रहता था. अधिकारी पदस्थापना से कतराते थे, व्यवसाय ठप थे और शादी-ब्याह तक रुक गये थे.आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं. लोग खुलकर जीवन जी रहे हैं, व्यापारी बिना डर के कारोबार कर रहे हैं और नक्सली व आपराधिक घटनाओं में भारी कमी आयी है.

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By Akarsh aniket

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